बदायूं। केंद्रीय सहकारिता और पूर्वोत्तर राज्य विकास राज्यमंत्री बीएल वर्मा की बात छोड़ दें तो जिले में कुछ ही नेता शेष हैं जिनका पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से बेहद नजदीकी रिश्ता रहा। कल्याण सिंह यूं तो पहली बार 1980 में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष माधव प्रसाद त्रिपाठी के साथ तत्कालीन भाजपा जिलाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा के आवास पर आए थे। इसके बाद उनका बदायूं से रिश्ता जुड़ गया।
वरिष्ठ भाजपा नेता पूर्व विधायक और दो बार भाजपा जिलाध्यक्ष रहे प्रेमस्वरूप पाठक से उनका गहरा रिश्ता रहा। 1975 में दोनों लोगों ने कानपुर में आरएसएस के प्राथमिक शिक्षा वर्ग में हिस्सा लिया यहां से इनकी मित्रता हो गई। कल्याण सिंह राजनीति में चले गए और प्रेम स्वरूप पाठक ने शिक्षक जीवन शुरू किया। प्रेम स्वरूप पाठक बताते हैं कि उनकी तैनाती प्रमोद इंटर कॉलेज सहसवान में थी। एक दिन वह कॉलेज में छात्रों की क्लास ले रहे थे इसी दौरान कल्याण सिंह उनसे मिलने कॉलेज आ गए। उस समय मोबाइल व फोन का ज्यादा चलन नहीं था। सन तो उनको याद नहीं लेकिन उस वक्त कल्याण सिंह स्वास्थ्य मंत्री थे। बाद में 1996 में वह भी विधायक चुने गए। कल्याण सिंह प्रदेश में मुख्यमंत्री बने। दोनों के बीच गहरी मित्रता रही। प्रेमस्वरूप पाठक बताते हैं कि उनकी हर बात को वह गौर से सुनते थे। एक बार वह एक प्रकरण को लेकर कल्याण सिंह से मिले और उनको पत्र दिया, कल्याण सिंह ने पत्र रद्दी में डाल दिया। यह उनको अच्छा नहीं लगा। बाद में उन्होंने कल्याण सिंह से अकेले में मुलाकात की तो उन्होनें बताया कि एक ब्राह्मण सम्मेलन में शामिल होने को लेकर वह उनसे कुछ खफा थे, लेकिन जब बाबूजी कल्याण सिंह को उन्होंने पूरी बात बताई तो गिले शिकवे दूर हो गए। इसके बाद वह कई बार उनके घर आए। जब भी बदायूं आते उनके आवास पर ही भोजन करते।
प्रेमस्वरूप पाठक ने कल्याण सिंह से जुड़े कई अन्य संस्मरण भी सुनाए। अयोध्या कांड हो या फिर मुलायम सिंह सरकार में कारसेवकों पर फायरिंग का मामला रहा हो। प्रदेश में भाजपा-बसपा के गठबंधन सरकार बदलती राजनीति को लेकर कल्याण सिंह की प्रेमस्वरूप पाठक से हमेशा चर्चा होती रही।
लोकसभा टिकट के साथ मिला था 50 हजार का चंदा
प्रेम स्वरूप पाठक का कहना है कि उनको सन याद नहीं है, लेकिन उस बार शरद यादव बदायूं से लोकसभा सांसद चुने गए थे। भाजपा और जनता दल के बीच गठबंधन में यह सीट जनता दल के खाते में गई थी। कल्याण सिंह की पहल पर ही उससे पहले बदायूं लोकसभा से भाजपा ने उनका टिकट तय कर दिया था। चुनाव लड़ने के लिए 50 हजार का चंदा भी मिला था, लेकिन शरद यादव के गठबंधन प्रत्याशी बनाए जाने पर उन्होंने चंदे के यह रुपये चुनाव पर ही खर्च कर दिए थे।
महेश गुप्ता ने लखनऊ में दी श्रद्धांजलि, बोले- मेरी तरक्की की जड़ में बाबूजी
नगर विकास राज्यमंत्री महेश गुप्ता रात में ही लखनऊ चले गए थे। रविवार को उन्होंने मुख्यमंत्री योगी की मौजूदगी में कल्याण सिंह के पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित किए। उन्होंने अमर उजाला को बाबूजी से जुड़े संस्मरण बताए। कहा कि उन्हें पहली बार भाजपा से विधायक का टिकट दिलाने में उन्हीं का हाथ था। टिकट चयन करने वाली कमेटी से कहा था कि महेश अच्छा व साफ छवि का लड़का है, ये विधायक बनेगा तो बेहतर काम करेगा। महेश याद करते हैं कि कल्याण सिंह उनके दहगवां व बदायूं आवास पर भी दो बार आए। जब उन्होंने आतंकवाद खत्म न होने तक अन्न ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा ली तो कई लोगों ने बाबूजी से कहा कि आपके कहने से महेश गुप्ता अन्न खाना शुरू कर देंगे। तब बाबू जी ने साफ मना कर दिया कि अच्छे काम के लिए प्रतिज्ञा ली है तो मैं मना नहीं कर सकता। राज्यमंत्री ने बताया कि बाबूजी को मोटी बूंदी के लड्डू बहुत पसंद थे। उनसे कहा तो उन्होंने गांव में लड्डू बनवाकर भेजे। तब बाबूजी ने अपने कर्मचारी से कहा कि इन्हें मेरे कमरे में रखवा दो।
पूर्व विधायक रामसेवक सिंह का भी कल्याण सिंह से नजदीकी रिश्ता रहा। अयोध्या कांड के दौरान सितंबर 1989 में रामसेवक जेल गए थे। भाजपा से पहला चुनाव उन्होंने जेल से लड़ा और विधायक चुने गए। कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री रहते कई बार उनके साथ काम करने का मौका मिला। इसके बाद रामसेवक सिंह 1991, 1993, 1996, 2005 और 2012 में लगातार विधायक चुने गए। रामसेवक सिंह ने कल्याण से जुड़े संस्मरण सुनाते हुए कहा कि बाबूजी जन-जन के नेता थे। साफ-सुधरी राजनीति कोई उनसे सीखे वह एक मजबूत प्रशासक थे। हिंदुत्व के लिए उन्होंने त्याग किया। कल्याण सिंह जैसा व्यक्तित्व होना मुश्किल है। कल्याण के निधन को रामसेवक सिंह व्यक्तिगत क्षति बताते हैं। सोमवार को नरौरा में कल्याण की अंत्येष्टि में भी वह शामिल होंगे।
अस्वस्थ हैं कल्याण के करीबी पप्पू भइया
दातागंज के पूर्व विधायक और 1989 के दौरान भाजपा जिलाध्यक्ष रहे अवनीश कुमार सिंह पप्पू भइया वयोवृद्ध नेताओं में शामिल हैं। इन दिनों वह अस्वस्थ चल रहे हैं। पप्पू भइया भी कल्याण सिंह के बेहद करीबियों में शामिल रहे हैं। पप्पू भइया के नजदीकी विनोद अग्रवाल समेत कई लोगों का कहना है कि कल्याण सिंह ने पप्पू भइया को हमेशा अलग ही तबज्जो दी।
सीकरी कांड में कलराज के साथ बिसौली आए थे कल्याण: दयासिंधु
पूर्व विधायक दयाशिंधु शंखधार ने भी शिक्षक जीवन के बाद लंबा राजनीतिक सफर तय किया है। 1993 में वह बिसौली विधानसभा से विधायक चुने गए। इस समय प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार बनी थी। इसी दौरान बिसौली के सीकरी में एक जातीय हिंसा हुई थी। यह प्रकरण काफी चर्चा में रहा। मामले को लेकर उन्होंने कल्याण सिंह से बात की तो कल्याण सिंह और कलराज मिश्र दोनों लोग सीकरी आए थे। पीड़ित परिवारों से मिले थे। कल्याण सिंह ने उनसे सीकरी कांड को लेकर गहन मंत्रणा की थी।
रामसेवक की रिहाई को धरना दिया बाबू जी ने: सुखदेव सिंह
- भाजपा के जिला उपाध्यक्ष और विद्यार्थी परिषद के पूर्व जिला संयोजक सुखदेव सिंह भी कल्याण सिंह से कई बार मिले। 1989-90 का दौर था। अयोध्या आंदोलन उस वक्त चरम पर था। प्रदेश में दंगों के दौरान रामसेवक सिंह को 28 सितंबर 1989 में जेल भेज दिया गया था। उस वक्त सुखदेव सिंह विद्यार्थी परिषद में जिला संयोजक थे। रामसेवक के जेल जाने की बात कल्याण को मालूम हुई तो उन्होंने रामसेवक को लेकर काफी पैरवी की। रामसेवक की रिहाई को लेकर धरना प्रदर्शन में भी कल्याण सिंह शामिल हुए थे।
राम मंदिर आंदोलन से दिलों में समा गए कल्याण
बिसौली के व्यापारी नेता और भाजपा के पूर्व मंडल अध्यक्ष राजाबाबू वार्ष्णेय भी कई बार कल्याण सिंह से मिले। राजाबाबू वार्ष्णेय का कहना है कि राम मंदिर आंदोलन से कल्याण सिंह हिंदू हृदय सम्राट बन गए, लोगों के दिलों में समा गए। पहली बार 2000 में कल्याण सिंह से वह दहगवां में मिले तो देखते ही उन्होंने कल्याण सिंह के पैर छू लिए। इस पर कल्याण ने दुलार के साथ उनकी पीठ पर घूंसा भी मारा। आज भी बाबूजी का वह दुलार उनको याद है।
रेलवे स्टेशन से करते थे बाबूजी को रिसीव
लगातार चार बार भाजपा जिलाध्यक्ष रहे डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा का कई साल पहले निधन हो गया है। उनके बेटे अजय शर्मा मेडिकल स्टोर चलाते हैं और अटल विचार मंच से जुड़े हैं। अजय शर्मा का कहना है कि पहली बार 1980 में कल्याण सिंह उनके घर आए थे। इसके बाद कई बार वह बदायूं ट्रेन से आते थे। रेलवे स्टेशन पर वह पिता के साथ कल्याण को रिसीव करने जाते थे। कल्याण सिंह के कई हस्तलिखित पत्र अजय शर्मा के पास आज भी मौजूद हैं।