नामांकन पत्रों की जांच के बाद अब बरेली के चुनाव मैदान से बसपा के हटने के चलते सियासी समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। नए समीकरणों में भाजपा और सपा अब सीधी टक्कर की तैयारी में जुट गए हैं। फिलहाल, बसपा के आधार वोट की भूमिका अहम मानी जा रही है। ऐसे में भाजपा और सपा अब इस बड़े वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने में जुट गए हैं।
नामांकन पत्रों की जांच में बसपा प्रत्याशी मास्टर छोटे लाल गंगवार की दावेदारी शनिवार को खत्म हुई गई। उनके अधूरे भरे नामांकन पत्र के चलते उन्हें मैदान से बाहर कर दिया गया है। अब बदले समीकरण के बीच एक लाख से ज्यादा बसपा के खांटी मतदाता बरेली लोकसभा के भविष्य में निर्णायक होंगे।
भाजपा ने आठ बार के सांसद रहे संतोष गंगवार की जगह छत्रपाल गंगवार पर भरोसा जताया है। हालांकि पार्टी में इसके बाद से अंदरूनी घमासान मचा है। वहीं, कांग्रेस-सपा गठबंधन से पूर्व सांसद प्रवीण सिंह ऐरन भाग्य आजमा रहे हैं।
बसपा के मैदान से हटने के बाद मुस्लिम मतदाताओं की एकजुटता से भगवा खेमे में चिंता की लकीरें हैं। इसके साथ ही भाजपा अब हिंदू मतों को एकजुट करने की पूरी कवायद में जुटी है। यहां बता दें कि पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा के उमेश गौतम ने 10 फीसदी मत हासिल किया था और उनके खाते में एक लाख से ज्यादा मत आए थे।
इससे पहले वर्ष 2014 में बसपा के इस्लाम सबीर अंसारी ने एक लाख 81 हजार और वर्ष 2009 में अकबर अहमद डंपी ने दो लाख से ज्यादा मत हासिल किए थे। इन आंकड़ों को देखते हुए इस बड़े वोट बैंक के रुझान को जीत-हार का आधार पर भी माना जा सकता है।
जातीय समीकरण और मतों के ध्रुवीकरण पर निगाह
कुर्मी और मुस्लिम मतदाताओं की चाल से तय होने वाले परिणाम पर भी सियासी दलों की निगाह है। भले ही 1989 से लगातार छह बार सांसद बनकर भाजपा के संतोष गंगवार ने इस सीट को भगवा गढ़ बनाने में भूमिका निभाई।
मगर, वर्ष 2009 में कांग्रेस के टिकट पर प्रवीण सिंह ऐरन ने उन्हें पटखनी देकर बदले समीकरण का आभास कराया था। हालांकि वर्ष 2014 के बाद भाजपा ने फिर वापसी कर ली। मगर, अब जातीय समीकरण और मतों के ध्रुवीकरण को भी चुनाव में निर्णायक माना जा रहा है।
आंवला में बसपा की चाल तय करेगी समीकरण
आंवला लोकसभा सीट पर नामांकन प्रक्रिया के अंतिम चरण में बसपा ने मैदान में वापसी कर ली है। यहां नामांकन पत्रों की जांच में बसपा प्रत्याशी की दावेदारी पर सवाल खड़े हो गए थे। हालांकि बसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से आबिद अली को पार्टी समर्थित प्रत्याशी बताए जाने के बाद उनका नामांकन वैध माना गया है। अब आंवला लोकसभा सीट पर बसपा की चाल समीकरणों की तस्वीर साफ करेगी। इस सीट पर अब लड़ाई त्रिकोणीय मानी जा रही है।