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बरेली में तो सिमट गया है जरी कारोबार

Mon, 05 Sep 2016 01:11 AM IST
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली।
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 दो दशक पहले तक  पेरिस और मिलान शहर में होने वाले चर्चित फैशन शो में भी बरेली में तैयार जरी काम बोलता था और आज के हालात देख कर लगता है कि कहीं ऐसा न हो कि एक दिन जरी हस्तशिल्प के मामले में बरेली का नाम ही न हट जाए। सरकारी नीतियां भी बिचौलिओं के बीच फंसे कारीगरों की स्थिति सुधार पाने में कारगर नहीं हो पायीं। यूपी में दो वर्ष पहले बनी हस्तशिल्प नीति अभी तक धरातल पर नहीं आ पायी। जिले से पहले निर्यातक गायब हो गए और अब कारीगर भी दूसरे प्रदेशों में पलायन कर रहे हैं। हजारों रुपये की ड्रेस, साड़ी और सूट आदि तैयार करने वाले लोग मनरेगा से भी आधी मजदूरी पा रहे हैं। जिले भर में चार लाख से ज्यादा जरी कारीगर हैं।  सबसे ज्यादा जरी काम पुराना शहर में होता है। जिले में  कारीगर सर्वे शुरू हुआ है, 18 वर्ष आयु या इससे अधिक आयु वाले सिर्फ 29 हजार कारीगर चिह्नित किए गए हैं। अब इनमें कई की लोकेशन जयपुर में जैसे शहरों में मिल रही है।
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सरकारी नीतियाें से दूरी
प्रदेश सरकार ने दस्तकारों की आर्थिक स्थिति सुधारने और तकनीकी प्रशिक्षण देने के लिए दो वर्ष पहले नीति बनायी थी। ब्यूरोक्रेसी ने इसे कारीगरों तक पहुंचाया तक नहीं है। चुनावी सरगर्मियां शुरू होने के बाद पिछले दिनों सर्वे जरूर हुआ है। केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री मुद्रा लोन योजना शुरू करायी थी। इससे कारीगर 50 हजार रुपये तक आसानी से लोन ले सकता है, यह योजना बिचौलिओं के इर्दगिर्द ही घूम रही है। बैंकों में सीधे काम होना मुश्किल जैसा ही है।

दो अरब का कारोबार
जिले से हर माह करीब दो सौ करोड़ रुपये का कारोबार होने का अनुमान है। ज्यादातर कारोबार बिचौलिओं के हाथ में होने से हस्त शिल्पियों को इसका कोई लाभ नहीं मिल पाता है।पहले  जिले में आधा दर्जन फर्में जरी उद्योग निर्यात कार्य करती थीं, पिछले पांच वर्षों में  पंजाब, दिल्ली और राजस्थान से निर्यात हो रहा है। बताया जाता है कि अब बरेली में बनने वाला जरी  घरेलू बाजार तक ही सीमित हो गया। 
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फटेहाल कारीगर
पूरे दिन काम करने के बाद कारीगर बमुश्किल सौ सवा सौ रुपये ही कमा पाते हैं। इस काम में अस्सी वर्ष से ज्यादा उम्रदराज तक लगे हैं।  पूरी मजदूरी नहीं मिलने से जरी कारीगरों का पलायन होता जा रहा है।  जयपुर, दिल्ली, लुधियाना, भटिंडा आदि शहरों में दस हजार से ज्यादा कारीगर पलायन कर चुके हैं। बरेली से हर दिन दो दर्जन से ज्यादा अवैध निजी बसें जयपुर आती जाती हैं।  मुख्तार अंसारी बताते हैं कि दो दशक पहले बरेली जरी उद्योग चरम पर था।  अगर इसे गंभीरता से नहीं लिया तो जरी हस्त शिल्प मानचित्र से बरेली जिला गायब हो जाएगा।

‘जरी कारीगर और उद्योग संरक्षण के लिए प्रदेश सरकार ने नीति बना दी है। उसे लागू कराया जा रहा है। सर्वे किया जा रहा है। साथ ही कारीगरोें को बाजार और तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा रहा है।’
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- एम. अफजल, जीएम, जिला उद्योग केंद्र
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