मेयर चुनाव के लिए मेयर प्रत्याशी के चयन का मुद्दा भाजपा के लिए ऐसा सरदर्दी बना कि अब तक शांत होने के बजाए और बढ़ता नजर आ रहा है। तमाम विरोध और ताकत झोंकने के बावजूद भाजपा का टिकट कब्जा कर उमेश गौतम ने बरेली मंडल के ही नहीं लखनऊ दिल्ली के दिग्गजों के आगे अपनी मजबूत पकड़ दिखा दी। इस पावर गेम में दिग्गज और कैडर के आगे अस्तित्व का सवाल खड़ा हो गया है।
शहर में आम चर्चा है कि सत्तारूढ़ दल के दिग्गजों के मुंह से निवाला निकालने वाला यह बाहरी धाकड़ तो वाकई सबसे बड़ा ताकतवर निकला। हैरत की बात यह भी है कि खुद अपने या दूसरे दावेदारों के लिए ताकत झोंकते दिख रहे गौैतम विरोधी बुधवार को खुद उन्हीं से सटे मुस्कुराते दिखाई पड़े। दूसरे साफ-सुथरी छवि वाले दावेदारों को कवच की तरह आगे लेकर चल रहे दिग्गज नेता को खुद ही भाजपा प्रत्याशी के टिकट का पूरा श्रेय दिया। दिग्गज अब अपने चहेतों और कैडर वालों से नजरें छिपाए बैठे हैं। दूसरे दिग्गज के विरोध से तो दिल्ली-लखनऊ हिलने की चर्चाएं गरम थीं, मगर हमेशा की तरह पलटी मारने वाले मिस्टर कूटनीतिज्ञ पार्टी प्रत्याशी को लड़ाने की हामी भर रहे हैं। सच तो यह है कि उनके चहेते गोपनीय बैठकों में धाकड़ की अकड़ ढीली करने को उन्हें हराने में जुट गए हैं। विरोधियों में दिग्गज के चहेते और कैैडर वाले सभी शामिल हैं, मगर खुला विरोध करने यानी चुनाव लड़ने को गले में घंटी बांधने की हिम्मत देर रात तक कोई नहीं जुटा सका। माना जा रहा है कि थोड़ा दबाव बनाकर इनमें से काफी तो ‘खामोश’ हो जाएंगे, क्योंकि धाकड़ सबको ‘मनाने’ का संदेश दे चुके हैं।
संघ और संगठन के विश्वस्त सूत्रों से खबर मिली कि राजेंद्र नगर के संघ परिवार से जुड़े रहने वाले एक मशहूर डॉक्टर के घर गोपनीय बैठक हुई। उसमें कद्दावर नेता के चहेते और उनके ‘चाणक्य’ भी पहुंचे। संघ से जुड़े रहे एक डॉक्टर दावेदार के अलावा दूसरे कद्दावर नेता के भाई समेत कैडर वाली कई हस्तियां शामिल हुईं। एनजीओ चलाने वाले एक पूर्व वरिष्ठ प्रचारक ने बैठक जुटाई थी। उसमें उमेश गौैतम को बाहरी बताते हुए कैडर और दिग्गजों से जुड़े नेताओं की फजीहत प्रमुख मुद्दा रहा। कहा गया कि बसपा से आकर उमेश गौतम ने सारे दिग्गजों को पछाड़ कर अपनी धमक दिखाई है। यदि शीर्ष नेतृत्व के पदाधिकारियों की यह मनमानी जीत दिलाने वाली साबित हुई तो कैडर वालों का अस्तित्व हमेशा के लिए संकट में पड़ जाएगा। सबने एकजुट होकर भाजपा प्रत्याशी को सबक सिखाने के साथ उनके आकाओं को भी करारा जवाब देने का फैसला किया। कद्दावर नेता के चहेते और संघ से जुड़े नेता को विरोध में चुनाव लड़ने को उकसाया गया, मगर चहेेते ने साफ कह दिया कि पार्टी के सिवा कुछ नहीं। मन खराब रहा तो घर बैठ जाऊंगा, मगर खुला विरोध नहीं करूंगा। डॉक्टर भी खामोश रहे।
रात में करीब सवा नौ बजे आईएमए हाल में एक गोपनीय बैठक बुलाई गई, मगर कुछ भेदियों ने इसे भी आम कर डाला। इससे संगठन से जुड़े एक पानी कारोबारी तो बेहद खफा हैँ। बोले- मेरा नाम न खुले। उसमें संघ से जुड़े रहे एक युवा डॉक्टर अगवा थे। वह इस कदर उखड़े हैं कि उनके विरोध में खड़े होने की चर्चाएं शुरू हो गईं। आखिर में उन्होंने कैडर के अपमान का झंडा उठाकर कुछ शीर्ष नेताओं के साथ एक लोकल कद्दावर को भी खूब कोसा। बोलेे, बिरादरी की मिट्टी पलीद कराई है इस व्यक्ति ने। अपने भविष्य के अलावा उन्हें कुछ नहीं दिख रहा। खुद से उठकर भी कुछ सोचना चाहिए। कद्दावर पूरी राजनीति पर कुंडली मारे बैठे रहे। दूसरों को उभरने नहीं दिया और अब एक बाहरी ने पूरे शहर के सामने सबकी हैसियत बता दी। जमकर भड़ास निकालने के दौरान यह भी कहा कि कैडर वालों की पूछ ही नहीं है और ऊपर से साफ इशारा नहीं तो सब अपने मन से जिसे चाहो लड़ाओ। फिर बिखराव समेटते हुए डॉ. तोमर की ओर इशारा किया गया। ताकि भाजपा प्रत्याशी को तो कैडर की हैसियत समझ में आए ही, उनके पैरोकारों को भी सबक मिले। कुल मिलाकर खुला विरोध करने के बजाए विरोधियों को मजबूत करके अपने को कमजोर करने की रणनीति तय की गई।
उधर, कैडर वाले अपनी पकड़ की मुस्लिम हस्तियों से भी भाजपा के खिलाफ किसी एक विरोधी को मजबूती के साथ लड़ाने का संदेश फैला रहे हैं। इन हालात में भाजपा कमजोर होती दिख रही है और सपा को बिना किसी कड़ी मेहनत के फायदा मिलने के संकेत हैं, मगर विरोधियों में चर्चा यह भी है कि जब उमेश गौतम ने सबको पछाड़ कर टिकट हासिल कर लिया तो तिकड़म और गणित से जीत का हिसाब भी बना लेंगे। भाजपा प्रत्याशी का दावा है कि उनके सामने दो बार के असफल मेयर डॉ. तोमर हैं और पार्टी कैडर वालों को मनाकर वह उन्हें हरा देंगे। पब्लिक जान गई है कि उनके विरोधी शहर को न कुछ दे सके और न कुछ दे सकेंगे। जवाब में डॉ. तोमर बेहद मधुर सरल भाषा मेें कहते हैं कि पैसे से टिकट हासिल करना अलग बात है और जनता का दिल जीतना अलग बात। पैसे, मनमाने दावे और घर बैठे ख्वाबों से मेयर की सीट जीतना मुश्किल होता है। कांग्रेस और बसपा के अलावा आप प्रत्याशी भी अपनी ताकत झोंके हैं, मगर शहर वालों को नतीजे उनकी चुनाव से पहले ही साफ नजर आने लगे हैं।