जैविक तथ्य चारित्रिक आकलन का आधार नहीं
शौर्य वेलफेयर सोसायटी की सचिव डॉ. बिंदिया सक्सेना ने कहा कि हाइमनोप्लास्टी में गिरावट चिकित्सा क्षेत्र का बदलाव नहीं बल्कि रूढ़ियों, अवैज्ञानिक परंपराओं के प्रति नई पीढ़ी की सोच का आईना है। युवा समझ रहे हैं कि महिला के चरित्र, व्यक्तित्व का आकलन जैविक तथ्य के आधार पर नहीं होना चाहिए। सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, कैमरा संस्कृति, पेशेवर प्रतिस्पर्धा से लोगों में जागरूकता बढ़ी है।
लिव-इन के दौर में टूट रहीं सामाजिक वर्जनाएं
बरेली कॉलेज समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. नवनीत कौर आहूजा के मुताबिक, डिजिटल युग में किसी विषय का ज्ञान एक क्लिक पर है। घूंघट से निकलकर महिलाएं लिव-इन तक पहुंच गई हैं। पहले विवाह और सामाजिक स्वीकार्यता का दबाव महिलाओं पर था। नई पीढ़ी व्यक्तिगत निर्णय, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को महत्व दे रही है। कॉस्मेटिक सर्जरी का बढ़ना चिकित्सा तकनीकों के प्रयोग की स्वीकार्यता को भी दर्शाता है।