करीब तीन साल की उम्र तक नवजात की आंखों में रोशनी पड़े या कानों में कोई आवाज पड़ने पर वे उग्र हो जाते हैं, तो अभिभावक को सचेत हो जाना चाहिए। क्योंकि, यह ऑटिज्म यानी स्वलीनता मानसिक बीमारी के संकेत हैं। मनोचिकित्सक के मुताबिक ऑटिज्म के मामले अब तेजी से बढ़ रहे है। पहले जहां माह भर में अधिकतम पांच केस आते थे, वहीं अब इनकी तादाद करीब 20 तक पहुंच चुकी है।
जिला अस्पताल स्थित मन कक्ष के मनोचिकित्सक डॉक्टर आशीष के मुताबिक स्वलीनता या आटिज्म एक दिमागी बीमारी है। मेडिकल साइंस में इसे 'डेवलपमेंटल डिसआर्डर' कहते हैं। जन्म के कुछ माह बाद ही इसके लक्षणों को समझ लिया जाए तो ऐसे बच्चों की देखभाल काफी आसान हो जाती है। ज्यादातर मामलों में अभिभावक बीमारी के बारे में तब जान पाते हैं, जब बच्चा बोलने लायक होता है। ऐसे बच्चे सामने वाले से अपनी बात कह नहीं पाते हैं। तब तक बच्चा पांच या इससे अधिक आयु का हो जाता है।
मिर्गी या अधिक गुस्सा करने की भी आदत
बताया कि जन्म के कुछ माह बाद शिशु आंखें नहीं मिलता या आवाज देने पर आंखों से कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है तो उसे तत्काल चिकित्सक को दिखाना चाहिए। ऐसे बच्चे जिस काम को करने लगते हैं, उनका मन उसी में लगा रहता है। कुछ मामलों में मिर्गी या अधिक गुस्सा करने की भी आदत होती है। कहा कि चिकित्सा विज्ञान में अभी तक इस बीमारी के कारणों को लेकर कोई ठोस वजह पता नहीं चल सकी है। हालांकि देश विदेश में शोध जारी है। माना जाता है कि इसकी वजह आनुवांशिक, जीन में परिवर्तन या गर्भावस्था की जटिलताएं हो सकती हैं। इससे पीडि़त बच्चा है तो उसका तिरस्कार नहीं, उसे प्यार करें। क्योंकि काउंसलिंग से बच्चा सही हो सकता है।
हर बच्चे में नजर आते हैं अलग-अलग लक्षण
मनोचिकित्सक के मुताबिक, इससे पीडि़त सभी बच्चों में लक्षण समान नहीं होते हैं। उनका स्वभाव या व्यवहार रोग की स्थिति के आधार पर निर्भर करता है। जैसे अगर बच्चा ऑटिज्म के ऑटिस्टिक डिसऑर्डर से पीड़ित है तो वह कभी-कभी अपने व्यवहार से अलग दिख सकता है, लेकिन किसी खास विषय पर उसकी गहरी रुचि हो सकती है। यही एक समानता ही बच्चों में दिखती है।
इलाज
स्पीच, ऑक्यूपेशनल, विहेवियर थेरेपी आटिज्म का कोई सटीक इलाज नहीं है। बीमारी की स्थिति व लक्षण के आधार पर चिकित्सक विहेवियर, स्पीच, और आक्युपेशनल थेरेपी आदि से नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। जरूरत पर कुछ दवा भी दी जाती प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही बच्चे की परवरिश किस तरह करनी है, अभिभावकों को भी प्रशिक्षण दिया जाता है।
दिखने वाले सामान्य लक्षण
- एक ही शब्द को बार-बार बोलना या बड़बड़ाना
- तीन साल होने पर भी हाथ, पंजे के बल चलना
- आयुवर्ग के दूसरे बच्चों से मेलजोल से बचना
- गलत काम को मना करने पर उग्र व्यवहार करना
- किसी अंग को खुजलाना, खुद को चोट पहुंचाना
- तोड़फोड़ करना, तेज आवाज में बड़बड़ाते रहना
- दूसरों की भावना या भावों को व्यक्त न कर पाना