महंगी सिंचाई मजबूरी बनी
रामगंगा बैराज परियोजना 12 वर्ष बाद भी पूरी नहीं हो पाई है। करीब 332 करोड़ रुपये की मूल लागत वाले प्रोजेक्ट की लागत बढ़कर करीब 2100.15 करोड़ रुपये पहुंच गई है। चौबारी में बांध बनने के बाद भी नहरें न बनने से किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पा रहा। अगर प्रोजेक्ट के लिए बजट मिल भी जाता है तो जमीन अधिग्रहण से लेकर नहरों की खोदाई तक में लंबा वक्त लगेगा। ऐसे में अगले कुछ सालों तक किसानों को महंगे दाम पर डीजल खर्च कर सिंचाई करना मजबूरी है।
फसल चौपट करने के साथ जान भी ले रहे छुट्टा पशु
आंवला क्षेत्र के मतदाताओं में दो तिहाई ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं। इसलिए खेती-किसानी से जुड़े मसले चुनावों के बिना भी हमेशा हावी रहते हैं। किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या छुट्टा पशु हैं। जगह-जगह गो आश्रय स्थल बनाए जरूर गए हैं, मगर इनमें से ज्यादातर बदहाल हैं। छुट्टा पशु खेतों में फसल बर्बाद कर रहे हैं। किसानों को रात-रात भर जागकर निगरानी करनी पड़ रही है।
सर्दी-गर्मी और बरसात के हर मौसम में किसान निगरानी करने के लिए मजबूर हैं। अगर एक भी दिन चूक हो जाए तो छुट्टा पशु पूरी साल की मेहनत बर्बाद कर जाते हैं। कई किसान फसल की निगरानी करते हुए ही छुट्टा पशुओं के हमले में जान गंवा चुके हैं। बिशारतगंज क्षेत्र में छुट्टा पशुओं को एक-दूसरे के खेत में घुसाने के विवाद में दो गांव के किसानों के बीच हुए खूनी संघर्ष में एक किसान की मौत भी हो चुकी है।