शक के घेरे में जेल प्रशासन
दरअसल जेल परिसर में बंदियों तक पहुंचने के लिए तीन गेट पार करने पड़ते हैं, जिन पर हमेशा जेल के सिपाही तैनात रहते हैं। जेल में दो स्कैन मशीन भी लगी हैं, जिनसे स्कैन होने के बाद ही बंदियों से मुलाकात की जा सकती है। जेल परिसर में हर जगह सीसीटीवी कैमरे भी लगे हैं। इतनी सुरक्षा के बाद अशरफ की सहायता बिना जेल अधिकारियों की मिलीभगत से नहीं हो सकती है।
बंदियों से मिलने के लिए जेल स्टाफ से पर्ची लेनी पड़ती है। उसके बाद हाथ पर मुहर लगाई जाती है। यह मुहर दिखाने के बाद ही जेल के अंदर मुलाकातियों को भेजा जाता है। फिर स्कैन मशीन और स्टाफ द्वारा हर मुलाकाती की सघन तलाशी होती है। उसके बाद ही बंदी से मुलाकात हो पाती है। ऐसे में अकेला सिपाही शिवहरि अशरफ के गुर्गों को अंदर ले जाकर इतने बडे़ अपराधी से कैसे मुलाकात कराता था, यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है।
इसलिए आरक्षी की गिरफ्तारी होने के बाद अब अधिकारियों की भूमिका भी जांची जा रही है। इस बात की भी जांच की जा रही है कि जेल में अशरफ को वीआईपी ट्रीटमेंट देने में किस अधिकारी की कितनी भूमिका है। इस स्थिति में अशरफ की जेल बदलना और बड़े अफसरों पर कार्रवाई तय मानी जा रही है।