बरेली। सरकार की योजनाएं और दावे-वादे अपनी जगह हैं लेकिन हकीकत यह है कि स्पोर्ट्स स्टेडियम सालोंसाल जूझने के बाद खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा निखारने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। हर साल लाखों का बजट खपाने वाले खेल विभाग को खेल प्रतिभाओं की कितनी चिंता है, इसका अंदाजा स्पोर्ट्स स्टेडियम के हॉकी ग्राउंड पर उड़ती धूल को देखकर लगाया जा सकता है। अपने जुनून के चलते कई बच्चे और युवा यहां रोजाना आकर प्रैक्टिस तो करते हैं, लेकिन कोच न होने की वजह से उनका हासिल कुछ भी नहीं है। कई सालों से हॉकी ग्राउंड पर पसीना बहा रहे इन खिलाड़ियों का कहना है कि कोच न होने की वजह से वे वह सबकुछ भी भूलते जा रहे हैं जो कुछ साल पहले यहां कोच से सीखा था।
हॉकी ग्राउंड पर प्रैक्टिस करने पहुंची एक किशोरी ने बताया कि चार साल पहले जब उसने स्टेडियम आकर प्रैक्टिस शुरू की थी, उस वक्त यहां अनवार सर हॉकी के कोच थे। उन्होंने बच्चों को तकनीकी तौर पर काफी पुख्ता किया, लेकिन उनके जाने के बाद अच्छा खेलने वाले खिलाड़ी भी बेकार हो गए। चार साल पहले ही यहां हॉकी के लिए रजिस्ट्रेशन कराने वाली एक दूसरी लड़की ने बताया कि स्टेडियम में हॉकी के डेढ़ सौ से ज्यादा बच्चे प्रैक्टिस के लिए आते थे। पूरा ग्राउंड भरा रहता था। 10-12 बच्चों ने स्टेट और नेशनल तक खेला। चार लड़कियों का सेलेक्शन सैफई के स्पोर्ट्स कॉलेज और तीन का गोरखपुर स्पोर्ट्स कॉलेज के लिए हुआ था। लेकिन अब यह सिलसिला थम गया है। एक युवा खिलाड़ी ने बताया कि खिलाड़ियों की संख्या ज्यादा होने की वजह से पहले टुकड़ों में प्रैक्टिस कराई जाती थी। जूनियर से ज्यादा सीनियर खिलाड़ी होते थे, लेकिन अब सीनियर खिलाड़ियों ने आना बंद कर दिया है। जूनियर खिलाड़ी भी बमुश्किल 10-12 ही आते हैं।
एक लड़की ने स्टेडियम की दीवार से सटे एक कमरे के बरामदे में रखे बॉक्स की ओर इशारा करते हुए बताया कि पहले प्रैक्टिस के लिए आने वाले बच्चों को स्टेडियम की ओर इसी बॉक्स से निकालकर हॉकी और बॉल दी जाती थी। अब यहां हॉकी नहीं मिलती। बॉक्स का ढक्कन तक टूट गया है। लड़की ने बताया कि पिछले कुछ सालों में जो कोच आए, उनमें खिलाड़ियों को कुछ सिखाने की ललक ही नहीं दिखी। अब तो खैर कोच ही नहीं है।
अंकल नाम मत छापना, वरना सर लोग..
हॉकी ग्राउंड पर प्रैक्टिस के लिए आए खिलाड़ियों ने बताया कि बरसात के बाद जब हॉकी ग्राउंड पर घास बड़ी हो जाती है तो स्टेडियम प्रशासन उसे कटवाने तक की जहमत नहीं उठाता। गर्मियों में यहां धूल उड़ती रहती है। डी पर अब चूना न डाले जाने और लाइनिंग न होने से प्रैक्टिस करने में दिक्कत होती है, लेकिन सर लोग इधर देखते भी नहीं हैं। खिलाड़ियों ने अपनी बात तो बेबाकी से रखी लेकिन चलते वक्त यह कहना भी नहीं भूले कि अंकल हम लोगों के नाम और फोटो मत छाप देना, वरना सर लोग हमें स्टेडियम में आने भी नहीं देंगे।
नेटबॉल खिलाड़ियों का भी झलका दर्द
बरेली। स्पोर्ट्स स्टेडियम के गेट से सटे नेटबॉल ग्राउंड में कुछ लड़के और लड़कियां बिना किसी कोच के ही प्रैक्टिस करते मिले। रिचा ने बताया कि वह नेशनल सबजूनियर खेल चुकी हैं। आगे बढ़ना चाहती हैं, लेकिन कोच न होने से उन्हें अपना सपना अब पूरा होता नहीं लग रहा। जो सीख चुके हैं, वह भी कहीं भूल न जाएं इसीलिए प्रैक्टिस करने स्टेडियम आते हैं। नेशनल जूनियर खेल चुकी भारती शर्मा का कहना था कि दो साल से नेटबाल के कोच नहीं हैं। नेशनल खेल चुके नीतेश ने बताया कि वह खुद प्रैक्टिस करने के साथ जूनियर खिलाड़ियों को भी थोड़ा बहुत गाइड कर देते हैं। इन खिलाड़ियों का कहना है कि अगर उन्हें पूरी खेल सुविधा और कोच मिले तोनेटबॉल के और भी बरेली से बहुत अच्छे खिलाड़ी निकल सकते हैं।
हॉकी खिलाड़ियों के लिए कोच की नियुक्ति कराने को चुनाव आचार संहिता हटने के बाद कोशिश करेंगे। स्टेडियम का ग्राउंड बेहतर बनाने के लिए भी प्रयास कर रहे हैं। पहले बोरिंग खराब होने के कारण पानी की कमी से ग्राउंड का रखरखाव ठीक से नहीं हो पाया, लेकिन अब पानी की कमी दूर हो गई है। ग्राउंड भी सुधरने लगा है। जो बच्चे नेटबॉल की प्रैक्टिस कर रहे हैं उनका पंजीकरण ही स्टेडियम में नहीं है। -विजय कुमार, क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी, बरेली