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.. और पंजे के बजाय कुर्सी के चुनाव चिन्ह पर लड़ा कांग्रेस प्रत्याशी

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आंवला। हर बार अंतिम समय में उम्मीदवार तय करने का खामियाजा कांग्रेस को 1989 के चुनाव में जमानत गवांकर भुगतना पड़ा। उस समय हाईकमान आंवला में वीआईपी उम्मीदवार खड़ा करने की कोशिश कर रहा था। तत्कालीन रक्षामंत्री केसी पंत का नाम जोरों-शोरों से चला मगर अंतिम समय में फैसला बदल गया और कल्याण सिंह सोलंकी को दोबारा उम्मीदवार बनाना तय हुआ। इस हड़बड़ी में कल्याण सिंह सोलंकी चुनाव चिन्ह के लिए जरूरी फार्म 12 समय से जमा नहीं कर सके और उन्हें पंजे के बजाय कुर्सी चुनाव चिन्ह लेकर मैदान में उतरना पड़ा। पंजा न मिलने का नतीजा यह हुआ कि कुल पड़े साढ़े चार लाख वोटों में उन्हें सिर्फ 28 हजार वोट ही मिल पाए।
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तीन दशक का रिकार्ड देखा जाए तो हर चुनाव में कांग्रेस ने आंवला सीट पर अंतिम समय में ही अपना प्रत्याशी घोषित किया। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस लहर में कल्याण सिंह सोलंकी ने यह सीट जीती। 1989 में हुए चुनाव में वह भाजपा से हार गए। 1991 में कांग्रेस ने अनजान से चेहरे रमा कश्यप को मैदान में उतारा। पूर्व सांसद स्वर्गीय जयपाल सिंह कश्यप की पत्नी होने के बावजूद वह चैथे नंबर पर रहीं। अगले चुनाव में अंतिम समय तक कोई निर्णय न हो पाने के कारण पार्टी के जिलाध्यक्ष रामनगर ब्लॉक प्रमुख और जनता दल नेता रघुनाथ लोधी को उनके घर बुलाकर दिल्ली ले गए और हाथोंहाथ टिकट भी दिला लाए। इस बार भी कांग्रेस के हिस्से में सिर्फ 12 हजार वोट आए। 1996 के चुनाव में कांग्रेस ने डीएच अंसारी को मौका दिया। उन्हें भी 17 हजार वोटों पर ही तसल्ली करनी पड़ी। 1999 में काफी मशक्कत के बाद स्वर्गीय कश्यप के बेटे चंद्रपाल सिंह कश्यप का नाम तय हुआ। इस बार वह 68 हजार वोट पाने में सफल रहे। 2014 में सलीम शेरवानी को 93861 वोट मिले।
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