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एक विरासत का अंत: छह अगस्त को थम जाएगा सिंडिकेट बुक हाउस का 42 साल का सफर, अब रह जाएंगी सिर्फ यादें

Tue, 03 Aug 2021 01:01 PM IST
सुशील कुमार कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली

सार

वर्तमान दौर की चुनौतियों, पारिवारिक प्रतिबद्धताओं और किताबों के चाहने वालों की कमी जैसी कई वजह हैं कि अब छह अगस्त सिविल लाइंस स्थित सिडिकेट बुक हाउस का आखिरी दिन होगा।
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सिंडिकेट बुक हाउस में जानकारी देतीं संचालिका संतोष वर्मा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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चार दिन बाद सिंडिकेट बुक हाउस का 42 साल का सफर थम जाएगा। यह महज एक बुक स्टोर का बंद होना नहीं है। किताबों के चाहने वालों के लिए एक युग के अंत होने जैसा है। न जाने कितने युवाओं की बचपन की यादें जुड़ी हैं और न जाने कितने लोगों ने अपनी उम्र का एक हिस्सा सिंडिकेट के साथ बिताया है।

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वर्तमान दौर की चुनौतियों, पारिवारिक प्रतिबद्धताओं और किताबों के चाहने वालों की कमी जैसी कई वजह हैं कि अब छह अगस्त सिविल लाइंस स्थित सिडिकेट बुक हाउस का आखिरी दिन होगा। पहले पति के साथ और लगभग 25 साल से खुद ही संचालन कर रहीं संतोष वर्मा का मन भी उतना ही व्यथित है, जितना कि किताबों के चाहने वालों का होगा। 

उनसे से जब इसके बंद होने पर बात की गई तो जुबां पर लफ्जों से पहले आंखों में आंसू आ गए। सोमवार की दोपहर शहर के बाजार के लिए आम दिन जैसी रही होगी लेकिन सिविल लाइंस स्थित सिंडिकेट बुक हाउस के लिए यह आम दिन नहीं था। किसी दौर में दस हजार किताबों से भरा रहने वाला सिंडिकेट अब खाली किया जा रहा था। लगभग आधी से ज्यादा किताबें समेटी जा चुकी हैं।
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यह बात और है कि नामचीन लेखकों की बेहतरीन कृतियां अभी भी शेल्फ की शोभा बढ़ा रही हैं। इसी दौरान बताया गया कि किताबों को पूरी तरह समेटन का काम शुक्रवार तक पूरा हो जाएगा और यही दिन इस प्रसिद्घ बुक हाउस का आखिरी दिन भी होगा।

1979 में हुई थी शुरुआत
संतोष वर्मा ने बताया कि उन्हें पढ़ने का खूब शौक था। यही वजह रही कि बरेली कॉलेज से रसायन विज्ञान में एमएससी करने के बाद उन्होंने अंग्रेजी साहित्य से एमए की शिक्षा ली। उनके पति आरजी वर्मा से उनकी मुलाकात भी एक बुक स्टोर पर ही हुई थी। किताब पढ़ने के शौक के कारण ही दोनों का मेलजोल बढ़ा और फिर
शादी कर ली। इसके बाद किताबों के प्रति उनके प्यार ने ही उन्हें बुक हाउस खोलने को प्रेरित किया। 

संतोष वर्मा ने शिक्षण और उनके पति ने एक निजी कंपनी को छोड़कर सिविल लाइंस स्थित चौराहे पर सिंडिकेट के नाम से 1979 में इस बुक हाउस की शुरुआत की थी। संतोष वर्मा कहती हैं कि शुरू होते ही यह बुक हाउस बरेली में किताबों के चाहने वालों की पसंद बन गया। एक दौर था जब किताब लेने के लिए भी लोगों की लाइन लगती थी। यह सिलसिला वर्षों तक चलता रहा और सिंडिकेट पूरे शहर के लिए एक धरोहर बन गया। 1995 में पति की मौत के बाद भी वह लगातार इस बुक हाउस का संचालन करती रहीं।

हर वर्ग के लिए किताबें होती थीं
संतोष वर्मा का कहना है कि सिंडिकेट में हर वर्ग के लिए किताबें होती थीं। साहित्य से जुड़े बड़े नामों के साथ देश के हर बड़े प्रकाशक की किताबें बरेली में मिल जाया करती थीं। इतना ही नहीं फिटनेस और कुकरी से जुड़ी
किताबें भी खूब बिकती थीं। बच्चों के लिए एक खास कोना होता था। उस कोने में वह बच्चों को निशुल्क ही कॉमिक पढ़ने को दिया करती थीं। कई बार तो ऐसा भी होता था कि बाजार में खरीदारी करने आने वाले अभिभावक अपने बच्चों को किताब पढ़ने के लिए सिंडिकेट पर छोड़ जाते थे। कुछ पाठक तो ऐसे होते थे जो नई
किताबों के बारे में जानकारी करते और तय कर लिया करते कि आते ही उन्हें किताब मिल जाए। उन्होंने बताया कि सेना से जुड़े लोग उनके पास काफी संख्या में आते थे। आज भी अनेक पाठक देश और विदेश से उनको फोन करके बताते हैं कि वह उनके यहां से किताबें लिया करते थे।

समय के साथ बदलता गया लोगों का शौक
एक दौर था जब बरेली में अंग्रेजी साहित्य की किताबों के चाहने वालों की संख्या बड़ी थी। बरेली कॉलेज से हजारों युवा अक्सर सिंडिकेट पर अपनी पसंद की किताबें लेने आते थे। एक दिन में किताबों की बिक्री सैकड़ों में पहुंच
जाती थी। धीरे-धीरे ऑनलाइन के चलन और किताब पढ़ने की संख्या में होती कमी के कारण बिक्री घटती गई। लगभग दो साल पहले इस बुक हाउस को बंद करने का विचार आया, लेकिन किताबों के प्रति प्यार ने ऐसा करने में इतना समय लगा दिया। कोरोना के दौर में तो बुक हाउस पर आने वाले की संख्या नाममात्र की ही रह गई। दोनों बेटियों को उनकी सेहत की भी फिक्र रहती है। यह भी एक वजह रही कि अब यह बुक हाउस हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।

यादें.... मैम ने दो साल सुरक्षित रखीं किताबें
मैंने दुबई में रहते हुए 2004 में अपनी पसंदीदा किताबें कुछ प्रकाशकों से मंगाई थीं। बरेली में किताबें रखने की और कोई जगह न होने की वजह से मैंने सिंडिकेट बुक हाउस पर ही उन्हें रखवा दिया। इसी बीच कैंसर होने की वजह से दो साल तक वह इंडिया वापस नहीं आ पाया। बचने की उम्मीद न के बराबर थी, इसलिए आर्डर कैंसिल करने को कह दिया था लेकिन बीमारी से उबरने के बाद 2006 में बरेली आने के बाद जब सिंडिकेट बुक हाउस पहुंचा तो देखा मैम ने उन किताबों को सहेजकर रखा हुआ था। इस बीच कई लोगों ने इन किताबों को खरीदना चाहा लेकिन उन्होंने किसी को नहीं दी। - डॉ. राहिल खान, दुबई में कार्यरत

सिंडिकेट बुक हाउस से बरसों का जुड़ाव
सिंडिकेट बुक हाउस से मेरा जुड़ाव 1996 से है। रुहेलखंड विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान बुक हाउस से जुड़ा रिश्ता कभी कमजोर नहीं पड़ा। बरेली में कोई अच्छी पब्लिक लाइब्रेरी न होने की वजह से जब भी किसी अच्छे लेखक को पढ़ना होता था तो सिंडिकेट बुक हाउस ही माध्यम बनता था। जब कभी रिसर्च पेपर लिखने होते हैं, तब भी सिंडिकेट बुक हाउस ही याद आता है। - प्रो. सुमित्रा कुकरेती, इग्नू

इस तरह पूरी हुई रिसर्च
मेरा रिसर्च वर्क मानवाधिकार पर था। उसके लिए जरूरी किताब कहीं नहीं मिली, लेकिन सिंडिकेट बुक हाउस पर मिल गई जो मेरे लिए गाइड साबित हुई। बरेली में बेहतर किताबों के लिए सिंडिकेट बुक हाउस एकमात्र विकल्प है। - डॉ. वंदना शर्मा, बरेली कॉलेज की चीफ प्रॉक्टर

नई किताब सिर्फ सिंडिकेट पर मिलती थी
बचपन से ही हिन्दी साहित्य पढ़ने का शौक था। साहित्यिक पुस्तकें सिर्फ सिंडिकेट बुक हाउस पर मिलती थीं। यहीं से हिंदी जगत के ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों को पढ़ने के लिए पुस्तकें खरीदता था। उस समय प्रेमनगर धर्मकांटा स्थित घर से पैदल ही सिंडिकेट बुक हाउस पर जाता था। - राजेन विद्यार्थी, सीए

सिंडिकेट जैसी किताबें कहीं नहीं
मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी रहा और बरेली में 1997 में आया था। साहित्य के प्रतिष्ठित लेखकों को पढ़कर रचनात्मकता बढ़ाने के लिए किताबें खोजने का प्रयास किया तो एक साथी ने उन्हें सिंडिकेट बुक हाउस का पता बताया था। पहली बार वहां सिर्फ एक पुस्तक लेने गया था लेकिन कई पुस्तकें खरीद लाया था। जैसी पुस्तकें वहां थीं, वैसी बरेली में अब भी कहीं और नहीं हैं। - डॉ. अवनीश, राजकीय इंटर कॉलेज के उप प्रधानाचार्य

पिता की किताब को दिलाई थी पहचान
मेरे पिता स्वर्गीय डॉ. के चंद्रा आईवीआरआई में वैज्ञानिक थे। सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने ‘माई एट ईयर्स इन इंग्लैंड ड्यूरिंग सेकंड वर्ल्ड वार’ पुस्तक लिखी थी। ऐसी पुस्तक के पाठक कहीं और मिलते यह मुमकिन नहीं था। इसलिए सिंडिकेट बुक हाउस पर ही उसे रखा था। ताज्जुब था कि कुछ ही दिनों में सारी प्रतियां बिक गईं। तब पता लगा कि वहां कितने पाठकों की पहुंच थी। - तुषार चंद्रा, पांचाल इतिहास परिषद के सचिव
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साहित्यिक किताबों के लिए इससे अच्छी शॉप नहीं हो सकती
सेंटमारिया में कक्षा 10 की छात्रा श्रीजा ने सिंडीकेट बुक हाउस से जुड़ी बातों को साझा करते हुए कहा कि यह शॉप तो बहुत पुरानी बताई जाती है। जिसे एक आंटी चलाती हैं जो बहुत अच्छी हैं। जब हम पहली बार गए तो आंटी ने बहुत अच्छे से स्वागत किया। शॉप भी बहुत सुंदर लगी। जहां तक बुक हाउस की बात है बरेली के लिए साहित्यिक किताबों के लिए इससे अच्छी शॉप नहीं हो सकती। जहां हिंदी उर्दू और अंग्रेजी तक की किताबों के शानदार कलेक्शन हैं। एक से बढ़ कर एक किताबें हैं। 

लगता है सबसे बेस्ट और इकलौता बुक स्टोर होगा, जहां टर्किश लेखक एलिफ शफक, अंग्रेजी लेखक डॉन ब्राउन, लियो टॉल्स ट्राय और एनीबेसेंट, ठाकुर रविंधर नाथ टैगोर, इस्मत चुगताई जैसे लेखकों की किताबें आसानी से मिल जाती हैं। यानी बायोग्राफी से लेकर आटोबायोग्राफी तक की बुक यहां उपलब्ध हैं। मुझे अच्छे लेखकों को पढ़ने का शौक है। इसलिए किताब खरीदने अक्सार जाना रहता है।

विश्वस्तरीय पुस्तकें को देखने और खरीदने का मौका मिलता है
कवि एवं चित्रकार रमेश गौतम बताते हैं कि पहले बरेली में बहुत अच्छे साहित्य नहीं मिल पाते थे। सिंडीकेट बुक हाउस ऐसा सेंटर है जहां विश्वस्तरीय पुस्तकें को देखने और खरीदने का मौका मिलता है। यह साहित्य और पुस्तकों के लिए मानी हुई शॉप है। बरेली का एक किताबों का ऐसा सेंटर है जहां पर हर तरह की स्तरीय किताबें मिल जाती हैं। आर्ट और पेंटिंग का भी बहुत अच्छा कलेक्शन रहता है। वहीं स्थानीय साहित्यकारों वीरेंद्र डंगवोल और सुकेश साहनी सरीखे लेखकों की पुस्तकें भी उपलब्ध रहती हैं। इसका बरकरारा रहना बेहद जरूरी है। कुछ हुआ तो बरेली का बड़ा नुक्सान होगा।
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