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सपा और भाजपा दोनों को आईना दिखा गए चुनावी नतीजे

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बाराबंकी। विधानसभा 2022 का चुनाव परिणाम वैसे तो सभी प्रमुुख दलों को आइना दिखा गया है। तीन-तीन सीटों पर सपा और भाजपा के दिग्गजों की मामूली अंतरों से जीत-हार के नतीजे कम चौंकाने वाले नहीं हैं। जिले में परिणामों से साफ हो गया कि अब न तो यह सपा का गढ़ रहा और न ही भगवा का।
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बसपा और कांग्रेस को भी जिले में राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए नतीजों पर गहरा मंथन और चिंतन करना पड़ेगा। क्योंकि छह विधानसभा सीटों के नतीजे चौंकाने वाले भले न हों पर यह तो तय कर रहे हैं कि अपने ही दल में वर्चस्व के लिए एक दूसरे को पटकनी देने की सियासत या यूं कहें कि भितरघातियों का हाथ कम नहीं माना जा रहा है। यही नहीं जिस तरह रामनगर और कुर्सी सीट पर तीन सौ से कम अंतर से हुई जीत-हार बूथ मैनेजमेंट का दावा करने वालों की पोल भी खोल कर रख दी है।
विधानसभा चुनाव में पीएम मोदी से लेकर अमित शाह, राजनाथ सिंह, योगी, स्वतंत्रदेव सिंह, अनुप्रिया पटेल, अनुराग ठाकुर से लेकर दर्जनों स्टार प्रचारक भाजपा के लिए सभाएं और रोड शो किया। तो सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भी दो सभाएं कीं। प्रियंका गांधी, छत्तीसगढ़ के सीएम और ओवैसी ने भी अपने-अपने प्रत्याशियों के लिए वोट मांगे। जनता का जनादेश जो मिला वह सभी दलों को आइना दिखाने वाला रहा। किन्तु तीन-तीन विधायक जीतने वाली सपा और भाजपा के लिए सबसे बड़ा आइना यहां के नतीजे रहे।
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सपा के दिग्गज नेता रहे स्वर्गीय बेनी प्रसाद वर्मा के पुत्र व पूर्व कैबिनेट मंत्री राकेश वर्मा की मात्र 217 वोटों से पराजय हो या फिर इसी दल के जिले के सबसे बड़े नेता माने जाने वाले पूर्व मंत्री अरविंद सिंह गोप की हार ने पार्टी नेतृत्व से लेकर जिले की राजनीति में बड़े उथल-पुथल का संकेत दे दिया है। क्योंकि दोनों की वर्चस्व की लड़ाई में सीटों का बंटवारा ऐसा हुआ कि दोनों का क्षेत्र बदलना पड़ा और दोनों हार गए। तीसरे पूर्व मंत्री फरीद महफूज किदवाई 261 वोटों से चुनाव जरूर जीत गए पर यह नतीजे जीत कर भी हार वाले साबित हुए हैं।
वहीं भाजपा जैदपुर, रामनगर और बाराबंकी सीट पर जिस तरह हारी है उसमें उनके बूथ मैनेजमेंट से लेकर चुनावी प्रबंधन पर सवाल खड़े हुए हैं। नेताओं के कार्यक्रम को तय करने का मामला रहा हो या फिर सबको साथ लेकर चलने वाला कदम कहीं दिखाई नहीं पड़ा। संघ से लेकर भाजपा स्वयंभू कार्यकर्ता चुनाव के दौरान बड़ी गाड़ियों से क्षेत्र में फर्राटा भरकर बैठकों में आंकड़ेबाजी तो खूब फिर की पर अनेकों जगह दूसरे विचारधारा वाले कार्यकर्ताओं को जिम्मा देने का खामियाजा भुगतना पड़ा। कांग्रेस का वोट बड़े स्तर पर घटा है।
पार्टी के कर्ताधर्ता माने जाने वाले पीएल पुनिया तीसरी बार अपने बेटे को चुनाव तो लड़ाया पर लगातार घटते जनाधार को नहीं रोक पाए। बसपा न तो कोई सीट जीत पाई और न ही अपना पुराना वोट बचा पाई। उनके परंपरागत वोटों में भारी कमी आई है। 2007 में बसपा ने पांच सीटें जीती थीं 2012 में सपा ने सभी छह सीटों पर जीत दर्ज की थी।
2017 में यह अभियान भाजपा के नाम रहा और छह में पांच सीटें जीतकर सपा के गढ़ पर कब्जा किया था। किन्तु इस बार सपा और भाजपा को तीन-तीन सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। और यही नहीं पार्टी के दिग्गज विधायक और पूर्व मंत्री हार भी गए। इस तरह चुनावी नतीजे चिंतन मंथन के साथ ही आइना दिखाने वाले हैं।
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