मौसम के दगा देने से अबकी होली के कई मायने बदल गए। बुजुर्ग किसान बताते हैं कि होली मुख्य रूप से फसल कटाई की शुरुआत का उत्सव होता है। होलिका दहन में गेहूं और चने की फसल के कुछ पौधे बांस में बांधकर भूने जाते हैं, पर अबकी ऐन मौके पर ओलावृष्टि और बारिश ने सदियों से चल आ रही इस परंपरा पर पानी फेर दिया।
होली की आग में भूनने लायक फसल बची ही नहीं। कुदरत की इस मार से किसानों और ग्रामीणों के चेहरों की रंगत बदली हुई है। उन पर होली का रंग नहीं चढ़ रहा।
बुजुर्ग किसानों के मुताबिक होली के दिन यह तय होता था कि फसल की कटाई किस दिशा से शुरू की जाए। यह शुद्ध फसल का पर्व है। इसमें किसी प्रतीक देवी-देवता की पूजा नहीं होती। यह पूरी तरह प्रकृति और किसानों से जुड़ा त्योहार है। यह भी
किंवदंती है कि होली में जलाई गई आग घर-घर पहुंचाई जाती थी। घर के चूल्हों में इस आग को पूरे साल सुरक्षित रखा जाता था। आग का बुझ जाना अपशकुन समझा जाता था। समय के साथ रवायतें भी बदल गईं। अब होली की आग चूल्हों तक नहीं पहुंचतीं। अलबत्ता फसल कटने से पहले कुछ पौधे होली की आग में भूने जाते हैं।
उसी के बाद फसल कटाई का काम शुरू होता है। किसानों को मलाल है कि अबकी यह परंपरा निभाई नहीं जा सकेगी। साल भर की मेहनत 20 दिन की ओलावृष्टि में मटियामेट हो गई। इन हालात में गांव की गलियों में होली के रंग कुछ खास गुल नहीं खिला पाएंगे।
बबेरू प्रतिनिधि के अनुसार, बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से फसलें तबाह होने के बाद ग्रामीण इलाकों में होली का पर्व फीका रहेगा। रंग और पिचकारियों की दुकानों से भीड़ गायब है।