बांदा। बुंदेलखंड में डकैतों का सफाया होने से उनकी बंदूकें खामोश हुईं तो लोगों ने भी हथियार डाल दिए। अब लोगों ने लाइसेंसी शस्त्र रखना बंद कर दिया। हालत यह है कि लाइसेंसधारकों के वारिस भी लाइसेंस का नवीनीकरण या पंजीकरण नहीं करा रहे हैं। इनका कहना है कि लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया काफी जटिल कर दी गई है। दूसरे अब डकैत भी नहीं रह गए हैं। इसलिए हथियार की जरूरत नहीं है।
बता दें कि जनपद में विभिन्न तरह के करीब 2000 शस्त्र दुकानों में जमा हैं, जिन्हें लाइसेंसधारकों के वारिसान नहीं ले रहे हैं। जिला प्रशासन ने दशकों से दुकानों में जमा ऐसे हथियारों की सूची तैयार कराई है। लाइसेंसधारकों के वारिसों की सहमति लेने के लिए उन्हें नोटिस भेजा जा रहा है। उनकी सहमति मिलने के बाद शासन से अनुमति लेकर ऐसे शस्त्रों को नष्ट कर दिया जाएगा।
दस्यु प्रभावित बुंदेलखंड में एक दशक पहले तक शस्त्र रखना स्टेटस सिंबल भी माना जाता था। लाइसेंस बनवाने के लिए लोग पैसा, सिफारिश और समय तक दांव पर लगा देते थे। वर्ष 2015 तक जिले में 10,880 लाइसेंस बनवाए गए, लेकिन इसके बाद जिले में सिर्फ 110 लाइसेंस बने हैं। इनमें 85 लाइसेंस उच्च न्यायालय के आदेश के बाद वरासत के तहत बने हैं। प्रशासन का मानना है कि 25 नए लाइसेंस गंभीर परिस्थितियों को देखते हुए जारी किए गए हैं। संवाद
इसलिए नहीं रही शस्त्र लाइसेंस बनवाने में रुचि
- डकैतों का सफाया होने के बाद से लोग बंदूक की जरूरत नहीं महसूस कर रहे हैं।
- शस्त्र लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया को जटिल बना दिया गया है, इससे लोग बचते हैं।
- खुशी वाले मौकों पर हर्ष फायरिंग पर रोक लगने से भी लोग हथियार लेने से बच रहे हैं।
- पुलिस की सक्रियता की वजह से भी लोगों को हथियारों की जरूरत नहीं महसूस होती है।
- किसी भी तरह के चुनाव के समय सबसे पहले लाइसेंसधारकों के शस्त्र जमा कराए जाते हैं।