बांदा। मखदूम रब्बानी के उर्स में शनिवार की रात आखिरी दिन नातिया और मनकबती मुशायरा हुआ। इसके पूर्व फातेहा, कुरान ख्वानी और दरगाह में चादर व गुल पोशी हुई।
अलीगंज स्थित रब्बानी आवास में मुशायरे में सज्जादानशीन सैय्यद खुश्तर रब्बानी ने शेर पढ़ा, तेरे दिवानों की तौकीर देखकर खुश्तर, खिरद के होशोहवास अब ठिकाने आए हैं।
फखरे आलम ने कहा, बुझा के शम्मे अना और नफरतों की दिए, चिरागे हुस्न अकीदत जलाने आए हैं। गौहर रब्बानी ने पढ़ा, वो किसलिए किसी नियामत के वास्ते तरसे, जिसपे आपका फैजान झूम के बरसे। डा. खालिद इजहार ने शेर कहा, मुझे भी मिल गया है मेरे पीर का दामन, इजहार अब मेरे भी दिन सुहाने आए हैं।
शमीम बांदवी ने पढ़ा, महक रहा है चमनजार उस गुलेतर से, किताबे हक जो सुनता रहा कटे सर से। सदारत कर रहे अमजद रब्बानी सहित अनवर बांदवी, वाकिफ सईद वारसी, सईद इटावी, नजरे आलम, वली, रहबर, सरवर, गुलजार, शरीफ, रईस, नवाब असर, मुनव्वर, मीर रब्बानी, नूर मोहम्मद, अकबर रब्बानी, अशअर रब्बानी, जाहिद रब्बानी, असगर रब्बानी ने भी शेर सुनाए। दुआ और सलाम के साथ उर्स का समापन हुआ।