बांदा। 12 जुलाई 1966। बांदा की धरती पर ऐतिहासिक लाल क्रांति का दिन। लाल झंडे तले बांदा मुख्यालय के अशोक लाट पर पुलिस की गोली से शहीद हुए दर्जनों क्रांतिकारियों को 54वीं बरसी मात्र भाकपा ने ही याद रखा। अन्य दल और संगठन भूल गए। भाकपा ने शहीदों को श्रद्धांजलि दी।
जिले की विभिन्न समस्याओं को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बैनर तले सैकड़ों मजदूर 12 जुलाई 1966 को कलक्ट्रेट के पास प्रदर्शन कर रहे थे। क्रांतिकारी नारों से आसपास का इलाका गूंज रहा था। मजदूर प्रशासन को अपनी पीड़ा बताने आए थे, लेकिन कलक्ट्रेट के बाहर स्वतंत्रता स्मारक अशोक लाट तिराहे पर इन मजदूरों को आगे बढ़ने से रोक दिया गया।
कुछ ही देर में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक आगा मुईनुद्दीन शाह आ गए और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस से फायरिंग करा दी। गोलियों से कई प्रदर्शनकारी मारे गए। बुजुर्ग बताते हैं कि इन सबको ट्रकों में भरकर चिल्ला घाट पर यमुना नदी में फेंकवा दिया गया। 540 प्रदर्शनकारी घायल हुए। उन्हें जेल भेज दिया गया। इनमें भाकपा के कई दिग्गज नेता भी थे।
रविवार को 54वीं बरसी पर भाकपा कार्यालय में शहीद दिवस मनाया गया। कोविड-19 की बंदी के चलते भाकपाइयों ने घरों पर ही शहीदों को श्रद्धांजलि दी। राष्ट्रीय परिषद सदस्य डॉ. रामचंद्र सरस ने कमासिन में श्रद्धांजलि दी।
उन्होंने तत्कालीन वामपंथी नेता दुर्जन भाई, रामसजीवन, देवकुमार यादव, चंद्रभान आजाद, रामकृपाल पांडेय, प्रहलाद, नाथूराम चंदेला इत्यादि को भी श्रद्धांजलि दी। जयकरन प्रजापति (रामपुर), मदनभाई पटेल (बरौली आजम), रामचंद्र वर्मा (जारी), मिथलेश निराला (पछौंहा), अमरनाथ राही (मुसीवां), प्रमोद कुमार आजाद (दादौं घाट), रामजी भाई (दलपा पुरवा), मदन मोहन शर्मा व देवीदयाल (बांदा), डा.अच्छे अली व शफात (हरदौली), वकार खां (बबेरू) आदि ने भी गांवों में श्रद्धांजलि दी।