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Banda News: रहने के लिए न घर बचा, न भोजन के लिए अनाज, पशुओं के लिए चारा भी नहीं

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नांदादेव गांव में गिरे मकान में बंधी भैंस - फोटो : संवाद
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बांदा। जसपुरा क्षेत्र के नांदादेव गांव की मैकी कहती हैं कि मकान गिर गए, खाने के लिए एक दाना नहीं है। पशुओं के लिए भूसा नहीं है। पांच दिन हो गए राशन और भूसा देने कोई नहीं आया। दूसरे गांव जाने का रास्ता बंद है। बाजार भी नहीं जा सकते हैं। ऐसी शिकायत और परेशानी लगभग हर बाढ़ पीड़ित की है। हालांकि, प्रशासन और नेता राहत सामग्री बांट रहे हैं लेकिन वह पर्याप्त साबित नहीं हो रही है। सभी पीड़ितों तक पहुंच भी नहीं पा रही है।
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यमुना और केन नदी उफनाईं तो कई गांवों में बाढ़ आ गई है। अब इन नदियों का पानी तो घट गया लेकिन बाढ़ पीड़ितों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। गांव लौटे ग्रामीणों के सामने तमाम परेशानियां और चुनौतियां हैं। बाढ़ में किसी का घर गिर गया है, तो किसी की गृहस्थी नष्ट हो गई है। मवेशियों के लिए चारा नहीं है। गांव के रास्तों से पानी तो उतर गया है लेकिन कीचड़ के कारण चलना मुश्किल हो रहा है। ग्रामीणों के सामने फिर से जिंदगी पटरी पर लाने की चुनौती है।
बाढ़ के पानी में पांच दिन तक डूबे रहे मकान या तो गिर गए हैं या नमी की वजह से गिरने के कगार पर हैं। अधिकारियों ने लोगों को अभी मकानों के अंदर जाने से मना किया है। बिजली और पानी की आपूर्ति ठप है। रात में अंधेरा होने से लोगों को कीड़े-मकोड़ों का डर सता रहा है। कीटनाशक का छिड़काव नहीं होने से संक्रामक बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। गांव के कई लोग बुखार, खांसी और जुकाम से पीड़ित हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीम शिविर के नाम पर औपचारिकता कर रही है। घंटा दो घंटा बैठने के बाद चली जाती है। बुखार पीड़ितों की जांच की व्यवस्था नहीं है।
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पांच दिनों से बिजली आपूर्ति ठप : पैलानी तहसील के 26 और बबेरू तहसील के सात गांवों में बाढ़ के कारण पांच दिनों से बिजली आपूर्ति ठप है। शाम से गांव अंधेरे में डूब जाते हैं। उधर, जल जीवन मिशन की पेयजल आपूर्ति भी बाधित है। बाढ़ से कुंओं का पानी खराब हो गया है। हैंडपंप प्रदूषित पानी दे रहे हैं। ऐसे में पानी की विकट समस्या हो गई है।

पैलानी क्षेत्र में 50 से अधिक मकान गिरे
पैलानी। चिल्ला, सिंधनकलां, गुरगवां, शंकर पुरवा आदि गांवों में 50 से अधिक मकान गिर गए हैं। कई कच्चे मकान गिरने की स्थिति में हैं। पक्के मकानों में बाढ़ का मलबा भरा है। दीवारों में सीलन है। बाढ़ के कारण संक्रामक बीमारियों ने पैर पसारना शुरू कर दिया है। चिल्ला में स्वास्थ्य विभाग ने शिविर लगाकर लोगों का उपचार किया लेकिन लोगों का कहना है कि शिविर में लाल-पीली गोलियां पकड़ा दी जाती हैंं। खून की जांच की व्यवस्था नहीं है। फार्मासिस्ट दवाएं दे रहे हैं। राहत सामग्री न पहुंचने से लोगों में प्रशासन के प्रति आक्रोश है। रमेश वाल्मीकि, रामराज वर्मा, माया पत्नी देवीचरन ने बताया कि बाढ़ ने सब कुछ छीन लिया है। दाने-दाने को मोहताज हैं। राहत सामग्री जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच रही है। लौमर की नई बस्ती निवासी चुन्नी, ललिता ने राहत सामग्री वितरण में भेदभाव का आरोप लगाया। संवाद
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