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हज के मंजर देख आवेदकों की आंखों में आंसू

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Tears in eyes of applicants seeing the sight of Hajj - फोटो : BANDA
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बांदा। आवेदन और पैसा जमा कर देने के बाद भी हज का फर्ज अदा न कर पाने का अफसोस और मलाल अब हज आवेदकों की आंखों से आंसू बनकर छलक रहा है। शनिवार से हज के अरकान (रस्में) शुरू हो गए।
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बीती रविवार की रात खान-ए-काबा का गिलाफ बदला गया। 17 जुलाई से हज के खास अरकान शुरू हो गए हैं। यह 22 जुलाई तक चलेंगे। कोरोना के तीसरी लहर के मद्देनजर सऊदी सरकार ने इस मर्तबा भी बाहरी लोगों को हज पर आने की इजाजत नहीं दी। सिर्फ 60 हजार स्थानीय बाशिंदे हज करते नजर आ रहे हैं। चित्रकूटधाम मंडल से आवेदन करने वाले आधा सैकड़ा से ज्यादा महिला-पुरुष यह मंजर ऑनलाइन स्क्रीनिंग पर देखकर बेहद गमजदा हैं।
चित्रकूटधाम मंडल से लगभग आधा सैकड़ा आजमीने हज ने फार्म भरकर लगभग 4-4 लाख रुपये जमा किया था। बांदा से 22, हमीरपुर से 16, महोबा से 12 और चित्रकूट से एक फार्म भरा गया था। अब इन सभी के खातों में पैसा वापस भेज दिया गया है।
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-आरिफ खां, सदस्य, प्राइवेट हज/उमरा समिति
कलक्ट्रेट में प्रशासनिक अधिकारी के पद से रिटायरमेंट के बाद हज की तैयारी थी। आवेदन और औपचारिकताएं पूरी कर ली थी, लेकिन कोविड के चलते सऊदी सरकार ने रोक लगा दी। बहुत ही सदमा हुआ है। हम फिलहाल हज से महरूम रह गए।
-सईद अहमद, बांदा।
जिंदगी का कोई भरोसा नहीं। बचपन से हज की तमन्ना थी। अबकी तैयारी थी। ऐन मौके पर उम्मीदों पर पानी फिर गया। मक्का और मदीना की पाकीजा सरजमीं में कदम रखने का मौका न मिला। अब वहां चल रहे हज का मंजर मोबाइल पर देखकर और अफसोस हो रहा है।
-अनवर जहां, रिटायर्ड प्रधानाध्यापक, चित्रकूट।
खाना-ए-काबा में तवाफ और मसजिदें नबवी में नमाज अदा करने का बेहद शौक और तमन्ना थी। एक अहम फर्ज अदा करने की तैयारी थी, लेकिन वबा (महामारी) ने सारी तमन्नाओं पर पानी फेर दिया। दुआ है कि अगले साल सब ठीक रहे और हम हज को जाएं।
-शेख अशरफ, महोबा।
फिलहाल घर में कोई फर्द हज का फरीजा पूरा नहीं कर पाया। इस सालजाने की पूरी तैयारी कर ली थी। हज हो जाता तो अपने घर में पहला हाजी होता, पर अल्लाह को शायद मंजूर नहीं था। आज जब हज के अरकान पूरे हो रहे हैं तो अजब महसूस हो रहा है। मौका मिला तो अगले साल जाएंगे।
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-इसरार हुसैन खां, हमीरपुर।
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