मंगलवार (23 दिसंबर) को एक बार फिर किसानों की
हमदर्दी के राग अलापे जाएंगे। किसान संगठन अपनी बदहाली बताएंगे तो सरकार और
उसके नुमाइंदे उनको योजनाओं के सब्जबाग दिखाएंगे।
उधर, बुंदेलखंड
में इस वर्ष (2014) भी अब तक 58 किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। वह कर्जदार
थे और फसल ने उन्हें दगा दे दिया। समाजवादी सरकार में यहां यही नारा
चर्चित है कि- ‘समाजवाद का यही नारा, नहीं मरा किसान हमारा’। प्रदेश के
राजस्व मंत्री शिवपाल कह चुके हैं कि बुंदेलखंड में किसी किसान ने कर्ज की
वजह से आत्महत्या नहीं की है।
देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह किसानों के रहनुमा कहे जाते थे। उन्हीं के जन्मदिन पर हर साल ‘किसान दिवस’ मनाया जाता है।
हर
साल किसानों के हक में बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। लेकिन किसान जहां के
तहां हैं। कुदरत की मार के साथ वह शासन और प्रशासन की उपेक्षा भी झेल रहे
हैं।
बुंदेलखंड में पिछले दो दशकों से परेशान किसान निराश होकर
आत्महत्याएं कर रहे हैं। किसानों से जुड़े संगठनों और पुलिस के आंकड़े
बताते हैं कि अब तक 3327 किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। इनमें 58 किसानों
से तो इसी वर्ष जान गंवाई है।
केंद्र और प्रदेश सराकरों की
कर्जमाफी योजनाएं पूरी तरह ढिंढोरा साबित हुईं। करीब एक करोड़ की आबादी
वाले जिस बुंदेलखंड में 60 फीसदी से ज्यादा किसान आबाद हों वहां मात्र
29,928 किसानों का 62 करोड़ 82 लाख 74 हजार 670 रुपया कर्ज माफ किया गया।
यानि ‘ऊंट के मुंह में जीरा’।
आरटीआई एक्टिविस्ट और समाजसेवी आशीष
सागर दीक्षित का कहना है कि बुंदेलखंड के ज्यादातर किसान राष्ट्रीकृत बड़े
बैंकों के कर्जदार हैं। जबकि सरकार ने सिर्फ कोआपरेटिव बैंक के कर्जदार
किसानों का कर्ज माफ किया है। यह किसानों के साथ धोखाधड़ी है।
चुनाव
के पहले सपा ने पूरा कर्ज माफ करने का ढिंढोरा पीटा था। यानि- ‘समाजवाद का
यही नारा, नहीं मरा किसान हमारा’। प्रदेश के राजस्व मंत्री शिवपाल सिंह
यादव स्पष्ट कह चुके हैं कि बुंदेलखंड में आज तक किसी किसान ने कर्ज की वजह
से आत्महत्या नहीं की है।