रामकन सिंह बच्चन, युवराज सिंह और महेंद्र सिंह वर्मा।
बांदा। विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही सियासी दलों में ‘आया राम-गया राम’ शुरू हो गया है। अपनी पार्टी में टिकट न मिलता देख दूसरे दलों में टिकट के लॉलीपाप में छलांगें लगाई जा रही हैं। शुरुआत सपा से हुई है। पहले जिला पंचायत पूर्व अध्यक्ष महेंद्र सिंह वर्मा गए और अब पूर्व जिला उपाध्यक्ष रामकरन सिंह बच्चन ने पार्टी से किनारा कर लिया। सपा का दामन छोड़ने वाले इन नेताओं ने भाजपा का झंडा थामा है।
सत्ता में आने के बाद सपा में नेताओं की भरमार हो गई। विभिन्न दलों से पाला बदलकर तमाम नेता ‘साइकिल’ पर सवार हो गए। उन्हें दलबदल का सिला भी मिला। महेंद्र सिंह वर्मा जिला पंचायत अध्यक्ष होकर ‘लालबत्ती’ पा गए। हालांकि कुछ दिन बाद ही सपा नेताओं ने ही उनकी लालबत्ती छिनवा दी। नरैनी (सुरक्षित) सीट से विधानसभा चुनाव लड़ने को बेताब महेंद्र सिंह वर्मा को सपा में गड़बड़ नजर आया तो भाजपा का दामन थाम लिया।
इसके बाद सपा के पूर्व एमएलसी युवराज सिंह पाला बदलकर भाजपा में चले गए। सपा को तीसरा झटका रामकरन सिंह (बच्चन) ने दिया है। वे लंबे अरसे से सपा में थे। जिला उपाध्यक्ष भी रहे। तिंदवारी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने को बेताब हैं लेकिन अचानक गुरुवार को सपा से किनारा कर भाजपा का दामन थाम लिया।
वे लखनऊ में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य की उपस्थिति में भाजपा में गए हैं। सपा से लगातार नेताओं के पाला बदलने पर सपा जिलाध्यक्ष शमीम बांदवी का कहना है कि ऐसे लोग पार्टी पर बोझ थे। अच्छा हुआ चले गए। सपा पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
भाजपा में शामिल हुए रामकरन सिंह उर्फ बच्चन का कहना है कि सपा में अब कार्यकर्ताओं की कद्र नहीं रही। चाटुकारों का वर्चस्व है। वे जमीनी कार्यकर्ता हैं, लेकिन पार्टी ने उनके कार्य व्यवहार को तवज्जो नहीं दी।
कहा कि उन्होंने जिला पंचायत चुनाव में अपनी बहू गीता सिंह को निर्दलीय चुनाव लड़ाकर जिताया। अध्यक्ष के लिए सपा से टिकट मांगा, लेकिन नहीं दिया गया। ऐसे व्यक्ति को दिया गया, जिसने टिकट लौटा दिया। बच्चन के मुताबिक उस समय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि वे जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में सपा प्रत्याशी का समर्थन करें। इसके बदले सम्मानपूर्ण स्थान दिया जाएगा, लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ। बच्चन 1996 में सपा हुए, ब्लाक और जिला कार्यकारिणी में सदस्य और जिला उपाध्यक्ष भी रहे।