मंडल मुख्यालय में अपचारियों के लिए बनाई गई लाखों रुपये की लागत वाली जेल सांप-बिच्छू और कीड़े-मकोड़ों का अड्डा बन कर रह गई है। दो दशक पूर्व बनी इस जेल इमारत में अब जंगल जैसा नजारा है। यह जेल चालू होती तो शायद चित्रकूट में भाग निकले चार बाल अपचारियों की घटना रोकी जा सकती थी।
चित्रकूट के कैदी बांदा में ही रखे जाते हैं। यहां मुख्य जेल के ठीक पीछे 1986 में दसियों लाख रुपये की लागत से अल्पवयस्क कारागार इमारत बनाई गई थी। इसकी क्षमता 100 बंदियों की है। शुरू के चार वर्षों में यहां बाल कैदियों को रखा गया। जेल में बैरकें और अन्य सभी जरूरी इमारतें हैं, लेकिन वर्ष 2000 में यह जेल वीरान हो गई।
यहां के जेल अधिकारियों ने इसे बंद कर दिया। दलील यह दी कि शासन ने बजट और स्टाफ उपलब्ध नहीं कराया। यहां के बाल अपचारियों को मुख्य जेल में अपराधियों के साथ रखा जा रहा है। हालांकि उनकी बैरक अलग है।
जेल का प्रयोग बंद होने के बाद इसके बुरे दिन शुरू हो गए। मेंटीनेंस के अभाव में जेल के अंदर झाड़ियां उग आईं हैं। इनमें सांप-बिच्छू और अन्य कीड़े-मकोड़े रह रहे हैं। इमारत भी जर्जर होती जा रही है। खिड़की और दरवाजे अज्ञात लोगों ने तोड़ डाले।
बांदा की जेल में ही चित्रकूट के कैदी और बंदी रखे जाते हैं। अगर यहां की अल्पवयस्क कारागार चालू होती तो चित्रकूट में निजी किराए के मकान में बाल अपचारियों को न रखा जाता। उन्हें इसी जेल भेजा जाता। उनके भागने की घटना न होती।
उधर, वरिष्ठ जेल अधीक्षक/डीआईजी एसके श्रीवास्तव ने बताया कि जल्द ही अल्पवयस्क जेल शुरू की जाएगी। सेफ्टी वाल (दीवार) निर्माण चल रहा है। इसे पूरा होने के बाद स्टाफ आदि की तैनाती के लिए शासन से प्रयास किए जाएंगे।