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पंडित दामोदर की बुंदेली भाषा पर पीएम दामोदर की चुप्पी

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PM Damodar's silence on Pandit Damodar's Bundeli language - फोटो : BANDA
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बांदा। 12वीं सदी में पंडित दामोदर द्वारा बुंदेली व्यक्ति प्रकरण की रचना के लिए मशहूर बुंदेलखंड को प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी अलग राज्य के रूप में नहीं स्वीकार कर रहे। शुक्रवार को बुंदेलखंड में प्रधानमंत्री की संभवत: सातवीं आमद थी। इस बार भी उन्होंने बुंदेलखंड राज्य के बारे में चुप्पी नहीं तोड़ी। ऐसे में बुंदेलखंड राज्य के पैरोकारों को फिर सदमा पहुंचा है। कई वर्षों से हलचल बना यह मुद्दा फिर अछूता रह गया।
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पंडित दामोदर द्वारा रचित व्यक्ति प्रकरण में पुरानी अवधि और शौर्यसैनी ब्रज के अनेक शब्दों का उल्लेख मिलता है। यही बुंदेली भाषा में भी है। लगभग एक हजार ईस्वी में बुंदेली पूर्व अपभ्रंश के उदाहरण हैं। बुंदेली की माता प्राकृत शौरसैनी और पिता संस्कृत भाषा है। इन दोनों भाषाओं में जन्म लेने के बाद भी बुंदेली भाषा अपनी चाल, प्रकृति और वाक्य विन्यास को अपनी मौलिक शैली है। पूरे देश में बुंदेली भाषा की अलग पहचान है।
यूपी-एमपी में फैले लगभग 19 जनपदों में फैले बुंदेलखंड को अलग राज्य का दर्जा देने की मांग कई दशक से चल रही है। राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठन इस मुद्दे पर आंदोलन करते रहे हैं। उत्तर प्रदेश की विधानसभा में बसपा सरकार में बुंदेलखंड राज्य का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेज दिया था, लेकिन यह ठंडे बस्ते में चला गया।
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एक करोड़ से भी ज्यादा आबादी वाले बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने की तमाम दलीलें हैं। कई संगठन सालों से आंदोलनरत हैं। बुंदेलखंड के पैरोकार अपने खून से हाल ही में प्रधानमंत्री को कई बार पत्र भेज चुके हैं। इन सबको उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव के मौसम में तमाम सौगातें बांट रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आल्हा-ऊदल की वीरभूमि महोबा में आमद के दौरान बुंदेलखंड राज्य की सौगात देंगे। लेकिन इनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। लगभग आधा घंटे के संबोधन/भाषण में प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे का कहीं लेश मात्र जिक्र भी नहीं किया। अंतत: बुंदेलखंड राज्य का मुद्दा एक बार फिर ठंडे बस्ते में जाना तय माना जा रहा है।
अपनी प्रकृति संपदा से ही सरसब्ज हो सकता है बुंदेलखंड
अलग राज्य के पैरोकार बुंदेलखंड में जिन जिलों को शामिल करने की सूची तैयार किए हुए हैं, उनमें उत्तर प्रदेश से बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, महोबा, जालौन, झांसी व ललितपुर हैं। इनके अलावा मध्य प्रदेश के छतरपुर, सागर, पन्ना, टीकमगढ़, दामोह, बिदिशा, दतिया, भिंड, सतना आदि जिले शामिल हैं। राज्य के लिए आंदोलन कर रहे बुंदेली समाज संगठन (महोबा) और बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा का कहना है कि बुंदेलखंड की खुद की इतनी प्रकृति संपदा है कि वह अपने संसाधनों से सरसब्ज हो सकता है। प्रस्तावित सभी जिलों को शामिल करने से इसकी आबादी चार करोड़ से ज्यादा होगी। दलील दी जा रही है कि जनसंख्या के नजरिए से यह देश का 9वां सबसे बड़ा राज्य होगा।
कोस-कोस पर बदले पानी, गांव-गांव में बानी
कोस-कोस पर बदले पानी, गांव-गांव में बानी। बुंदेलखंड के लिए कवियों ने यही लिखा है। यहां कुछ ही दूरी पर वाणी (बोलचाल) बदल जाती है। इतें-उतें (इधर-उधर) जैसे बुंदेली शब्द आज भी प्रचलित है। प्राचीन काल में राजा-महाराजा आदि बुंदेली भाषा में ही पत्र व्यवहार करते थे। रानी झांसी के कई पत्र इसकी बानगी हैं। औरंगजेब और शिवाजी भी यहां के राजाओं से भी बुंदेली भाषा में ही पत्र व्यवहार करते थे। जानकार कहते हैं कि बुंदेली में बांदा का अक्खड़पन है तो दूसरी तरफ नरसिंहपुर की मिठास भी है।
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