बांदा। शहीदाने कर्बला की याद में हर साल मनाए जाने वाले 10 दिवसीय मोहर्रम के रस्मी आयोजन लगातार दूसरे साल भी बगैर परंपरागत आयोजनों के सादगी और खामोशी से निपट गए।
शुक्रवार को 10वीं मोहर्रम (यौम-ए-आशूरा) मनाया गया। ताजिया, ढाल सवारी जुलूसों पर रोक के चलते सड़कों पर हुजूम नदारद रहा। पहली मोहर्रम से ही प्रशासन ने सार्वजनिक स्थलों में आयोजनों पर सख्ती से रोक लगा दी थी। मोहर्रम मनाने वाले मन मसोस कर रह गए।
इमामबाड़ों में ही ढाल सवारी और प्रतीकात्मक छोटे ताजिये रखकर रोजाना फातिहाख्वानी का सिलसिला चलता रहा। 9वीं की रात होने वाले अलाव और ढाल सवारी प्रदर्शन भी नहीं हुए। 10वीं पर भी इमामबाड़ों से कर्बला तक जाने वाले ढाल सवारी, अलम, ताजियों के जुलूस नहीं आए।
ई-रिक्शा और बाइकों पर ताजिये केन नदी किनारे ले जाकर खोदे गए गड्ढों में दफन कर दिए गए। पूर्वी कोठी शिया इमामबाड़ों से भी ताजिये सादगी से ले जाकर दफन किए गए। काले लिबास में शिया अकीदतमंदों ने मातम किया। रोक बावजूद शाम को क्योटरा स्थित प्रतीकात्मक कर्बला परिसर में लोगों का मेला रहा।
हालांकि, ढाल सवारी इत्यादि नहीं रही। उधर, यौम-ए-आशूरा पर काफी लोगों ने रोजा रखा। विशेष खाने बनवाकर बांटे। 9वीं और 10वीं पर हर इमामबाड़े में पुलिस का पहरा रहा। जगह-जगह पुलिस का गश्त रहा। प्रशासनिक अधिकारी भी भ्रमण करते रहे।