बांदा। स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही मरीजों की जान पर बन सकती है। बगैर रेडियोलॉजिस्ट के निजी अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड केंद्र संचालित हैं। प्रशिक्षण लेकर प्रमाणपत्र पा चुके एमबीबीएस डाक्टर रेडियोलॉजिस्ट की भूमिका निभा रहे और मरीजों का अल्ट्रासाउंड कर रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग ने भी प्रशिक्षण प्रमाणपत्र के आधार पर निजी अस्पतालों को अल्ट्रासाउंड संचालन की मंजूरी दे रखी है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जिले में मात्र एक रेडियोलॉजिस्ट है, लेकिन अल्ट्रासाउंड सेंटर 16 पंजीकृत हैं। हैरत की बात है कि रेडियोलॉजिस्ट के बगैर इतनी बड़ी संख्या में अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालित हो रहे हैं। इनमें मेडिकल कॉलेज व जिला अस्पताल सहित 14 प्राइवेट अस्पताल शामिल हैं। अल्ट्रासाउंड संचालन का लाइसेंस लेने वाले प्राइवेट अस्पतालों में शहर के 12 और बबेरू व अतर्रा में एक-एक हैं। जिला अस्पताल को छोड़कर अन्य कहीं भी अल्ट्रासाउंड केंद्र में रेडियोलॉजिस्ट नहीं है।
जुगाड़ व्यवस्था के तहत मरीजों को इसका लाभ दिया जा रहा है। सरकारी अस्पतालों में अव्यवस्थाओं से अधिकांश मरीज निजी अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड कराने को मजबूर हो रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने खुद स्वीकारा कि रेडियोलॉजिस्ट के अभाव में निजी अस्पतालों में एमबीबीएस डाक्टर मरीजों का अल्ट्रासाउंड कर रहे हैं। हालांकि, इन सभी ने अल्ट्रासाउंड का प्रशिक्षण प्राप्त कर रखा है। प्रशिक्षण प्रमाणपत्र के आधार पर उन्हें अल्ट्रासाउंड केंद्र संचालन का लाइसेंस दिया गया है।
सरकारी अस्पतालों के अल्ट्रासाउंड कक्षों में ताले
सरकारी अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड संचालन का बुरा हाल है। रेडियोलॉजिस्ट की कमी से जूझ रहे अस्पतालों के अल्ट्रासाउंड कक्षों में ताले लटक रहे हैं। महिला अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट न होने से अल्ट्रासाउंड कई माह से बंद है। पंजीकरण भी नहीं कराया, जबकि गर्भवतियों के इलाज में अल्ट्रासाउंड जरूरी है। नतीजे में उन्हें महंगा खर्च कर अन्य केंद्रों में अल्ट्रासाउंड कराना पड़ रहा है। वहीं जिला अस्पताल में महोबा के रेडियोलॉजिस्ट को संबद्ध कर अल्ट्रासाउंड संचालन शुरू किया गया, पर वह यहां मात्र तीन दिन ही बैठते हैं। इससे मरीजों को भरपूर फायदा नहीं मिल पा रहा है।
पंजीकरण खत्म, फिर भी हो रहे अल्ट्रासाउंड
करोड़ों रुपये की लागत वाले मेडिकल कॉलेज में भी सुविधाओं का टोटा है। खास बात यह है कि पंजीकरण अवधि समाप्त होने के बावजूद यहां अल्ट्रासाउंड हो रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, मेडिकल कॉलेज में अल्ट्रासाउंड लाइसेंस की अवधि 10 जुलाई को खत्म हो चुकी है। कालेज प्रशासन ने अब तक कोई आवेदन नहीं किया। उधर, प्रधानाचार्य डा. मुकेश कुमार यादव ने बताया कि अब तक रेडियोलॉजिस्ट न होने से अल्ट्रासाउंड नहीं हो रहा था। जिला अस्पताल से सेवानिवृत्त हुए रेडियोलॉजिस्ट डा. पीएस सागर संविदा पर तैनात किए गए हैं। पिछले चार दिनों से अल्ट्रासाउंड सेवा शुरू हो गई। बताया कि लाइसेंस की समय सीमा खत्म होने की उन्हें जानकारी नहीं है। शीघ्र औपचारिकता पूरी कर पंजीकरण कराया जाएगा। (संवाद)
रेडियोलॉजिस्ट न होने पर निजी अस्पतालों में पोस्ट ग्रेजुएट बाल रोग, स्त्री रोग विशेषज्ञ और एमबीबीएस डाक्टर अल्ट्रासाउंड कर रहे हैं। ये सभी अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों से रेडियोलॉजिस्ट का एक माह का प्रशिक्षण लेकर प्रमाणपत्र हासिल किए हैं। प्रशिक्षण प्रमाणपत्र के आधार पर ही अल्ट्रासाउंड संचालन की अनुमति दी गई है, जांच कराएंगे। जिन अस्पतालों में अप्रशिक्षित लोग अल्ट्रासाउंड कर रहे, उनके विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी।
- डा. वीके तिवारी, सीएमओ बांदा