बांदा। पढ़ने की उम्र नहीं, ज्ञान का अंत नहीं। गुनाहों ने भले ही सलाखों के पीछे पहुंचा दिया हो लेकिन उनमें पढ़ने की ललक कम नहीं हुई। बंदियों की मांग पर जेल प्रशासन ने 50 से अधिक बंदियों को साक्षर बनाने के लिए स्कूल में दाखिला कराया है। हालांकि, पढ़ाई उनकी जेल के अंदर ही होती है।
मंडल कारागार में चल रही साक्षरता पाठशाला की कमान बेसिक शिक्षा विभाग के एक पुरुष व महिला शिक्षिका को सौंपी गई है। शिक्षक पुरुष बंदियों व किशोर उम्र के बच्चों को और शिक्षिका महिला बंदियों को पढ़ाती-लिखाती हैं। कारागार अधीक्षक, जेलर व अन्य स्टाफ इन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित करते हैं। खास बात यह है कि पढ़ने-लिखने वाले इन बंदियों व किशोरों से कारागार में अन्य काम नहीं कराए जाते हैं। पाठ्य पुस्तकें बेसिक शिक्षा विभाग ने इन्हें उपलब्ध कराई हैं।
जेल अधिकारियों के अनुसार जिन बंदियों का बेसिक शिक्षा विभाग के कंपोजिट विद्यालय पुलिस लाइन में दाखिला कराया गया है।
उनमें ज्यादातर हत्या, अपहरण, दहेज हत्या जैसे संगीन आरोप में सालों से जेल में बंद हैं, लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से इन्हें स्कूल नहीं भेज जाता है। जेल में ही पाठशाला लगती है। सरकारी शिक्षक पढ़ाने के लिए आते हैं।