कालिंजर। कार्तिक पूर्णिमा पर लाखों श्रद्धालुओं ने
पौराणिक कोटितीर्थ व बुड्ढा-बुड्ढी तालाब में स्नान कर नीलकंठ का जलाभिषेक
किया। कालिंजर के ऐतिहासिक मेले में देश-प्रदेश सहित विदेशी भक्तों ने
नीलकंठ, पार्वती और कार्तिकेय की पूजा-अर्चना की।
वेद पुराणों में
वर्णन है कि भगवान शिव ने विषपान करने के बाद हर जगह भ्रमण किया। लेकिन
उन्हें शांति कालिंजर में ही मिली। यहां भगवान नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध
हुए।
बताते हैं पहले यह मां काली का स्थान शक्तिपीठ था। भगवान शिव
के आने के बाद काली यहां से कोलकाता चली गईं। दुर्ग में नीलकंठ के साथ ही
मां-पार्वती और उनके पुत्र कार्तिकेय विराजमान हैं।
कार्तिक
पूर्णिमा में स्नान का यहां विशेष महत्व है। यह ऐतिहासिक मेला कार्तिकेय के
उपलक्ष्य में लगता है। आजादी के बाद से इस मेले की व्यवस्था की कमान
प्रशासनिक समिति के जिम्मे है।
कार्तिक पूर्णिमा पर मंगलवार की पूरी
रात श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। भक्तों ने कोटितीर्थ और बुड्ढा-बुड्ढी
तालाब में स्नान कर रोगों व संकटों से मुक्ति की प्रार्थना की।
दुर्ग में स्थित भगवान नीलकंठ में दूध, दही, शहद से जलाभिषेक किया। बेल-पत्र, फूल, फल, मिठाई चढ़ाकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की।
एसडीएम
व सीओ नरैनी, थानाध्याक्ष शिवसागर पांडेय सहित सुरक्षा व्यवस्था के लिए
पीएससी और कई थानों की पुलिस फोर्स मौजूद रही। मेला चौकी प्रभारी अनूप
पांडेय ने बताया कि मेले में 6 बच्चे परिजनों से अलग हो गए।
खोया-पाया
केंद्र से उन्हें अभिभावकों को सौंपा गया। उधर, खप्टिहाकलां में
महाकालेश्वर मंदिर में दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं ने रुद्राभिषेक किया।
मेले का लुत्फ उठाया।
मेले के पहले दिन आसपास के गांवों के महिलाओं
व बच्चों ने घर-गृहस्थी का सामान व खिलौने खरीदे और मेले का लुत्फ उठाया।
रात में कलाकारों द्वारा प्रस्तुत रामलीला मंचन का आनंद लिया।