शिवरात्रि के मौके पर पाकिस्तानी जेल से रिहा हुए मछुआरे मंगलवार को एक बार फिर अपने परिवार के बीच थे। उनके वापसी पर बेंदाघाट के जसईपुर गांव में दोबारा जश्न मनाया गया। आतिशबाजी और अनारदाने फूटे।
इसके पूर्व शिवरात्रि के दिन रिहाई की खबर मिलने पर मछुआरों के परिजनों ने दिए जलाकर दीवाली मनाई थी। कराची (पाक) की लांड्री जेल से 340 दिन बाद रिहा हुए जसईपुर गांव के शिवशरन, महेंद्र, धनराज और विक्रम मुंबई से गुजरात होते हुए मंगलवार को शाम गांव पहुंचे। अपनी मनौती के मुताबिक गांव जाने से पहले सब गांव के नजदीक यमुना नदी गए और स्नान किया।
नदी किनारे स्थित काली माता मंदिर में माथा टेका। इधर, बिछड़े भाई, पिता, बेटे के आने की खबर परिजनों को सुबह ही मिल गई थी। चारों के घरों में खुशियों का माहौल था। घरों में दाखिल होते ही कुछ देर यह खुशियां मार्मिक दृश्य में बदल गई। किसी को उसका बिछड़ा बेटा मिला तो किसी को पति और भाई। एक-दूसरे से गले लिपटकर सभी की आंखे झलक आई।
शिवशरण की पत्नी चंदा बाई और धनराज की पत्नी प्रेमा देवी ने पहले ही आरती के थाल सजा रखे थे। अपने पतियों को सामने पाकर आरती उतारी। गांव में आतिशबाजी के धमाके गूंजे। अनारदाने से रंगबिरंगी रोशनी बिखरी। चारों के घरों में गांवों का जमघट लग गया।
पाक बंदियों को मुर्गा-मीट भारतीयों को दाल-रोटी
बेंदाघाट। जेल में बिताए 340 दिन जसईपुर के मछुअारों को ताउम्र याद रहेंगे। जेल की यातनाएं याद आते ही घर लौटने की खुशियां कुछ देर के लिए काफूर हो गईं। शिवशरण, महेंद्र, धनराज और विक्रम ने बताया कि 14 मार्च 2014 को वह रोजमर्रा की तरह नाव पर समुद्र में मछली का शिकार करने गए थे।
उन्हें पता चला कि कब उनकी नाव पाकिस्तानी सीमा वाले समुंदर में प्रवेश कर गई। अचानक पाकिस्तान की नावों पर जल सैनिकों ने उनकी नाव घेर ली और उन्हें अपने कब्जे में कर ले गए। कानूनी औपचारिकता के बाद उन्हें लांड्री जेल भेज दिया।
उन्होंने बताया कि जिस बैरक में उन्हें रखा गया, वहां उनकी तरह पकड़े गए 90 भारतीय मछुआरे कैद थे। पाक बंदियों को जहां मुर्ग और मीट परोसा जाता था वहीं भारतीयों को रोटी, दाल और पानी जैसी चाय दिया जाता था। बदले में काम भी भरपूर लिया जाता रहा।
जेल अफसरों के आगे किसी भारतीय मछुअारे की मुंह खोलने की हिम्मत नहीं। भूले-भटके कोई यह दुस्ताखी कर बैठता तो उसे कड़ी मेहनत के काम में लगाकर सजा दी जाती थी। शिवशरन का कहना था कि वह अपनी बेटी अमृता की शादी के लिए पैसा कमाने को गुजरात गया था। शादी हो गई, लेकिन वह नहीं लौट सका।
धनराज ने बताया कि उन्हें रिहाई के कुछ दिन पहले यह भनक लगी थी कि जिस दिन वर्ल्ड कप में भारत-पाक के बीच मैच होगा। उसी दिन रिहाई होगी। यही हुआ भी। लांड्री जेल से उन्हेें रिहा करके पाक पुलिस ने अमृतसर में बाघा सीमा पर भारतीय पुलिस के हवाले कर दिया भारतीय पुलिस उन्हें अहमदाबाद के बेरावल बंदरगाह ले गई।
वहां उनकी नाव के मालिक (ठेकेदार) यूसुफ भाई ने उन्हें एक दिन अपने पास रोका और वापसी के लिए घर तक का टिकट और चार-चार हजार रुपये देकर विदा किया। महेंद्र कुमार का कहना था कि ‘सिर मुड़ाते ही ओले पड़ गए।’ वह कमाई के इरादे से पहली बार गुजरात गया था।