बांदा : रमजान में दुआ करती नन्ही जैनब फात्मा।
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बांदा। माहे रमजान का एक हिस्सा (अशरा) पूरा हो गया। सोमवार को 10वें रोजे को रोजेदारों ने पहले अशरे के आखिरी रोजे का इफ्तार दुआ के साथ किया। अब मंगलवार से 11वें रोजे से दूसरा अशरा (10 दिन) शुरू होगा। यह अशरा मगफिरत (गुनाहों की माफी) का होता है। रमजान में कुल तीन अशरे होते हैं।
अशरा अरबी का 10 नंबर होता है। रमजान के तीस दिनों को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला अशरा पहले रोजे से 10वें रोजे तक होता है। इसे रहमत का अशरा कहा जाता है। रोजेदार रोजा और इबादतों से परवरदिगार की रहमत हासिल करता है। दूसरा अशरा 11वें से 20वें रोजे तक होता है। इस मगफिरत का अशरा कहते हैं।
इन 10 दिनों में रोजेदार अपने गुनाहों की माफी की दुआ करता है। आखिरी अशरा 21वें रोजे से 29वें या 30वें रोजे तक होता है। यह अशरा जहन्नम (नर्क) से निजात की दुआ का होता है। तीनों अशरों में सबसे महत्वपूर्ण आखिरी अशरा माना जाता है। इसी अशरे में वो तीन रातें हैं जिन्हें लैलतुल कद्र कहते हैं। ये रातें बेहद अहम होती हैं।
शहर काजी मौलाना कमरुद्दीन कहते हैं कि रमजान माह नेकियों का महीना है। दिन-रात रोजा, नमाज, तिलावत, इबादत में बिताना ही इस माह का हक अदा करना है। उन्होंने कहा कि इस महीने में अन्य महीनों के मुकाबले दुआएं ज्यादा कुबूल होती है। हमें अपनी दुआओं में मुल्क की तरक्की, सलामती और इस साल खासकर कोरोना वबा (महामारी) से निजात की जमकर दुआ करनी चाहिए।