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सूखे ने 40 फीसदी घटाई पेयजल की उपलब्धता

Wed, 01 Jun 2016 12:25 AM IST
ब्यूरो अमर उजाला, बांदा
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पानी भरकर ले जातीं महिलाएं - फोटो : प्रतीकात्मक फोटो
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जिलेवासी भले ही पानी के लिए तरसते रहें लेकिन शासन जल संस्थान पर हर साल करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहा है। जल संस्थान में अफसरों और कर्मचारियों की लंबी फौज के वेतन और अन्य खर्चों का सालाना बजट लगभग 15 करोड़ रुपये है। पिछले तीन साल में जल संस्थान इस पर 45 करोड़ 71 लाख रुपये खर्च कर चुका है। इसके बाद भी मांग के मुताबिक पानी नहीं मिल रहा है। जल संस्थान ने स्वीकारा है कि सूखे के दौर में जिले की पेयजल की उपलब्धता में 40 फीसदी की कमी आ गई है।
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जन सूचना अधिकार अधिनियम के तहत समाजसेवी कुलदीप शुक्ला ने जल संस्थान से सूचना मांगी थी। इसमें पूछा गया था कि जिले में पानी की मांग कितनी है और कितना उपलब्ध कराया जा रहा है? कितनी कमी आई है? कितना खर्च होता है? पेयजल के स्रोत क्या-क्या हैं? जल संकट से निपटने की क्या कार्य योजना है?

इसके जवाब में जल संस्थान के अधिशासी अभियंता की ओर से दी गई सूचना के मुताबिक जल संस्थान ने पिछले तीन साल में अपने वेतन, संचालन और रसायन संबंधी कामों में 75 करोड़ 71 लाख 33 हजार रुपये खर्च किए हैं। वर्ष 2013-14 में 17 करोड़ 74 लाख, वर्ष 2014-15 में 13 करोड़ 62 लाख और वर्ष 2015-16 में 14 करोड़ 34 लाख रुपये खर्च किए हैं।
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यह भी बताया गया है कि जिले में रोजाना 56.35 एमएलडी (मिलियन लीटर डेली) पानी की मांग है। जबकि उपलब्धता 46.82 एमएलडी है। जल संस्थान ने स्वीकारा है कि केन नदी और नलकूपों का जल स्तर अत्यधिक कम हो जाने से पानी की उपलब्धता में लगभग 40 फीसदी की कमी आई है।

उधर, सूखाग्रस्त जिले में पड़ रही भीषण गर्मी के बीच जल संस्थान उपभोक्ताओं को पर्याप्त पानी उपलब्ध करा पाने में नाकाम हो चुका है। सूखे के हालात से निपटने के लिए जल संस्थान ने शासन को कार्य योजना भेजी थी जो ठंडे बस्ते में है। अब तक धेला नहीं मिला है।

जल संस्थान के एक्सईएन ने यह भी बताया कि पाइप पेयजल योजनाओं के समय-समय पर पुनर्गठन की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। अधिकांश पेयजल योजनाएं 1970 से 1984 के बीच तैयार हुई हैं। इनमें कई योजनाएं काफी बड़ी हैं। अधिकांश क्षेत्रों में पेयजल उपलब्धता के अभाव में मांग के मुताबिक जलापूर्ति नहीं हो पा रही है। शहरी और ग्रामीण पेयजल योजनाओं के गठन के लिए कार्रवाई जरूरी है। बुंदेलखंड, पेयजल प्रभावित क्षेत्र है। अत: यहां समुचित पेयजल व्यवस्था जरूरी है।

जल संस्थान के आंकड़ों के मुताबिक जिले के आठ नगरीय क्षेत्रों में सवा तीन लाख आबादी पर 42 नलकूप हैं। 1755 हैंडपंप हैं। पानी की जरूरत 36.35 एमएलडी है। उपलब्धता सिर्फ 29.61 एमएलडी है। 6.74 एमएलडी की कमी है। जन सूचना अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई सूचना में अधिशासी अभियंता की ओर से बताया गया है कि बांदा नगर में 22 नलकूप और 955 हैंडपंप हैं। 112 हैंडपंप रिबोर होने हैं।

यहां पानी की जरूरत 26.03 एमएलडी है। मिल रहा है सिर्फ 21.96 एमएलडी। सात ओवरहेड टैंक हैं। 15,327 नल कनेक्शन और 207 किलोमीटर लंबी पाइप लाइन है। अतर्रा में छह नलकूप व 215 हैंडपंप हैं। 3.97 एमएलडी की मांग है। 3.23 एमएलडी उपलब्ध है। यहां 1364 नल कनेक्शन और 36 किलोमीटर पाइप लाइन है।

नरैनी में छह नलकूप व 89 हैंडपंप हैं। मांग 1.32 एमएलडी है। आपूर्ति 1.05 है। 539 नल कनेक्शन और 20 किलोमीटर लंबी पाइप लाइन है। बबेरू में तीन नलकूप हैं। तीनों फेल हो गए हैं। 73 हैंडपंप में 12 रिबोर योग्य हैं। पानी की जरूरत 1.65 एमएलडी और आपूर्ति 1.10 एमएलडी है। 1520 नल कनेक्शन और 33 किलोमीटर पाइप लाइन है। सभी आठ नगर क्षेत्रों में 1755 हैंडपंप बताए गए हैं। इनमें 166 रिबोर लायक हैं। 21,179 नल कनेक्शन हैं। 379 किलोमीटर लंबी पाइप लाइन है।
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