खरपतवार और कृषि अवशेषों से खाद तैयार करते प्रगतिशील किसान।
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बांदा। फसल के अवशेष/पराली जलाने का पूरे देश में हो रहे विरोध के बीच बुंदेलखंड के किसानों को प्रगतिशील किसान ने इन अवशेषों को फसल बढ़ाने का माध्यम बनाने के टिप्स दिए हैं। खेत में पराली जलाने को खेती के खिलाफ बताते हुए कहा है कि इससे खेत की जीवित भूमि बंजर हो जाती है। पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। थोड़ी से हिकमत और प्रबंधन से यह कचरा फसल के लहलहाने में मददगार बन जाता है।
बुंदेलखंड जैविक कृषि फार्म के संचालक और प्रगतिशील किसान मोहम्मद असलम खां (छनेहरा) ने कहा कि खेत में खरपतवार या अवशेष जलाने से भूमि की सतह का तापमान ज्यादा हो जाता है। फसल को उपजाऊ बनाने वाले सूक्ष्य जीव व फफूंद आदि नष्ट हो जाते हैं। जमीन कठोर हो जाती है। दूसरी तरफ पर्यावरण प्रदूषित होता है।
उन्होंने कहा कि वह अपने कृषि फार्म में वर्ष 2002 से अवशेष नहीं जलाते। डिस्क हैरो रोटावेटर आदि उपकरणों से इन्हें मिट्टी में पलट देते हैं। जीवामृत व वेस्ट डी कंपोजर का प्रयोग करके इसे खाद में परिवर्तित कर देते हैं। गाय के गोबर, मूत्र मिलाकर केंचुओं के माध्यम से उच्च गुणवत्तायुक्त वर्मी कंपोस्ट बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि धान की पराली को बिना जलाए जीरोटीलेज सीड ड्रिल व सुपर सीडर उपकरणों की सहायता से धान की कटाई के तुरंत बाद गेहूं की सीधी बुवाई करके पराली का उपयोग गेहूं फसल में मल्चिंग में किया जा सकता है।