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‘सदमे में नहीं, पुत्र की करतूत पर दंपति ने दी जान’

Mon, 27 Apr 2015 11:52 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
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घर में आग लगाने के बाद खलिहान को भी आग के हवाले करके जिंदा जल मरे किसान दंपति फसल बर्बादी के सदमे में नहीं, अपने पुत्रों की करतूतों से झुब्ध थे। ऐसी नालायक संतान को कैसे शासकीय सहायता दिलाएं। यह कहना था जिलाधिकारी सुरेश कुमार का। वे घटना के बाद सोमवार को गांव में जांच करने पहुंचे थे। यहां उन्हें बताया गया कि मृतक किसान पर 1.90 लाख रुपये बैंक का कर्ज था। इस घटना के बाद से पूरे गांव में शोक छाया हुआ है।
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कमासिन थाना क्षेत्र के अछरील गांव में रविवार को शाम किसान रामकृपाल यादव (60) और उसकी पत्नी लच्छी (57) ने पहले अपने घर में आग लगाई और फिर खलिहान में रखी फसल को आग के हवाले करके दोनों ने एक साथ उस पर छलांग लगा ली।

दोनों आग में जिंदा जल गए। सोमवार को मीडिया में प्रमुखता से खबर छपने के बाद डीएम सुरेश कुमार और एसपी राकेश शंकर अछरील गांव पहुंचे। उनके साथ एसडीएम विनय कुमार, तहसीलदार और बीडीओ व क्षेत्राधिकारी आदि भी थे। डीएम ने कमासिन थाने में मीडिया से बातचीत में कहा कि रामकृपाल ने फसल बर्बादी के सदमे में आत्महत्या नहीं, बल्कि अपने पुत्र की करतूतों से आजिज आकर खुदकुशी की है।
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उधर, पोस्टमार्टम हाउस में मौजूद मृतक दंपति के पुत्र शिवशरण ने बताया कि उसके पिता रामकृपाल ने इलाहाबाद यूपी ग्रामीण बैंक की पछौंहा गांव की शाखा से 1.90 लाख रुपये कर्ज ले रखा था। साहूकारों और रिश्तेदारों का भी लगभग 60 हजार रुपये देना था।

फसल बर्बाद होने से अदायगी नहीं हो पाई। इसकी चिंता और तनाव में उन्होंने आत्महत्या जैसा कदम उठाया। जिला कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश शुक्ला सहित कांग्रेस नेता संकटा प्रसाद त्रिपाठी, राजकुमार गर्ग, शोएब रिजवी, संजय द्विवेदी, नाथूराम सेन आदि ने पोस्टमार्टम हाउस में मृतक दंपति के दोनों पुत्रों और परिजनों से मिलकर शोक जताया। कांग्रेस नेताओं ने प्रशासन पर संवेदनहीनता का आरोप लगाया। कहा कि इस दर्दनाक आत्महत्या पर भी प्रशासन लीपापोती कर रहा है।

‘मै मौतों की सच्चाई तक जाता हूं’
कमासिन। अछरील गांव से लौटे डीएम थाने में मीडिया से मुखातिब थे। उन्होंने बताया कि बांदा जनपद में दैवी आपदा पीड़ित किसानों को अब तक 70 करोड़ रुपये बांटे जा चुके हैं। अभी 320 करोड़ रुपये और बंटेंगे। वे किसानों के प्रति हमदर्द हैं।

उन्हें ज्यादा से ज्यादा मदद दिला रहे हैं। उनका प्रयास होगा कि किसानों को इतनी मदद दिला दें, जितनी इसके पूर्व किसी डीएम ने न दिलाई हो। मीडिया के सवाल पर डीएम झल्लाए भी, बोले- मीडिया का काम अलग है, प्रशासन का अलग। मैं मौतों की सच्चाई की तह तक जाता हूं।

इनसेट
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शव ले जाने को भाड़ा नहीं, बांदा में ही किया अंतिम संस्कार
बांदा। खलिहान को चिता बनाकर खुद जिंदा जल मरे किसान दंपति के बचे-खुचे शवों को पोस्टमार्टम हाउस तक लाने के लिए उनके बेटों को कर्ज लेना पड़ा। पुत्र शिवशरण और शिवकरण ने पोस्टमार्टम हाउस में बताया कि पुलिस या प्रशासन ने शव भेजने के लिए वाहन की कोई व्यवस्था नहीं कराई।

वह 4000 रुपये किराए पर प्राइवेट एंबुलेंस करके शव लाए। पोस्टमार्टम के बाद वापस गांव तक शव ले जाने के लिए उनके पास पैसा नहीं बचा, इसलिए पोस्टमार्टम हाउस से कुछ दूर केन नदी के हरदौली घाट में अंतिम संस्कार कर दिया। उधर, इस बारे में कमासिन थानाध्यक्ष निर्मल वाजपेयी का कहना है कि घटनास्थल पर मृतक दंपति के पुत्र या कोई परिजन नहीं पहुंचे।

रात में उन्होंने खुद आग से शवों को बाहर निकलवाया और पछौंहा गांव से ट्रैक्टर मंगवाकर शवों को कमासिन तक भिजवाया। थानाध्यक्ष का कहना था कि पोस्टमार्टम हाउस तक शव भेजने के लिए वाहन की व्यवस्था परिजन ही करते हैं, पुलिस नहीं।

दंपति ने 3 साल पहले छोड़ दिया था गांव
बांदा। किसान रामकृपाल और लच्छी को अक्षरील गांव उनकी मौत ही ले आई। बड़े बेटे से विवाद के चलते तीन साल पहले दंपति गांव छोड़कर भदवारी चले गए थे। इसी सप्ताह बड़ा बेटा राजा उन्हें वापस गांव ले आया। पड़ोसियों ने बताया कि बड़े बेटे राजा पर बैंक व साहूकारों का करीब डेढ़ लाख रुपये कर्ज है।

छोटा बेटा चुनकउना अपनी ससुराल बबेरू (नहर के पास) कई सालों से रह रहा है। वह कटाई-मड़ाई के बाद अक्सर घर से अनाज आदि ले जाता था। यह बात बड़े भाई राजा को नागवार गुजरती थी। वह बंटवारे की जिद पर अड़ा था। भदवारी में रह रहे मां-बाप को राजा बंटवारा कराने की मंशा से सप्ताह भर पहले गांव ले आया था।
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