बलिदान दिवस पर दाराशिकोह को पुष्पांजलि देते विभिन्न संगठनों से जुड़े लोग।
- फोटो : अमर उजाला
बांदा। बादशाह शाहजहां और बेगम मुमताज के बड़े बेटे शहजादा दारा शिकोह को उनके बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि दी गई। इतिहासकारों और साहित्य प्रेमियों ने मानव धर्म मिशन और राधाकृष्ण बुंदेली मेमोरियल फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में गोष्ठी आयोजित की। दाराशिकोह को हिंदू-मुस्लिम एकता का समर्थक और सहिष्णुता का प्रतीक बताया। स्वराज शिक्षा सदन सभागार में मंगलवार को मनाए गए बलिदान दिवस में दाराशिकोह के चित्र पर फूल चढ़ाए गए। गोष्ठी का संचालन कर रहे बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा अध्यक्ष कैप्टन सूर्य प्रकाश मिश्र ने कहा कि दारा शिकोह ने हिंदू धार्मिक ग्रंथों रामायण और महाभारत समेत 52 उपनिषदों का अनुवाद संस्कृत से फारसी में किया। सूफी संतों के जीवन चरित्र पर ‘रिसालए हकनुमा’, ‘अकसीरे आजम’ और ‘मुकालमय बाबालालौ’ का विवेचन किया।
बुजुर्ग समाजसेवी बीडी गुप्ता ने कहा कि महान इतिहासकार बरनियर ने अपनी भारत यात्रा की पुस्तक में लिखा है कि दारा में अच्छे गुणों की कमी नहीं थी। ऐसे महान शहजादे को उसके सगे भाइयों ने मारा और धर्मद्रोही घोषित करके मृत्युदंड दिया। ऐसे नायक को हिंदू धर्म का बलिदानी कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा। कवि जवाहरलाल जलज ने दाराशिकोह के कविता संग्रह लेखन पर प्रकाश डाला। कहा कि साहित्यकार हिंदू या मुस्लिम नहीं होता। वह समाज का आइना होता है। दिल्ली से आए आईयू खां ने कहा कि आज सारी दुनियां को ऐसे ही शहजादे की जरूरत है। पूर्व प्रधानाचार्य बाबूलाल गुप्त ने कहा कि दारा की नजर में द्रव्य में आत्मा का अवतरण और निर्माण आदि परिलक्षित होते हैं। गोष्ठी में राम प्रताप शुक्ला, नाथूराम लश्करी, माधव सैनी, श्रीश शर्मा, ओम प्रकाश मसुरहा, शैलेंद्र सिंह बुंदेला, सुरेंद्र सिंह ने भी विचार प्रकट किए। साथ ही दाराशिकोह को पाठ्य पुस्तक में शामिल करने की मांग की। रामकेश तिवारी, जीशान, अतुल मिश्र, रहमान, शैलेंद्र आदि शामिल रहे।