केंद्र सरकार ने अनुमति दी नहीं और वन अधिनियम की आपत्तियों को भी दरकिनार कर केन नदी में बालू कारोबारियों ने आर-पार पुल तैयार कर दिया है।
इसकी अनुमति कुछ शर्तों के साथ मंडलायुक्त कार्यालय से अनधिकृत रूप से दे दी गईं और वह भी वन विभाग की आपत्ति के बावजूद। केंद्रीय जल आयोग ने इस पर आपत्ति जताते हुए अपने उच्चाधिकारियों (आगरा मंडल) को रिपोर्ट भेजी है।
सदर तहसील के पथरी और छेहरांव गांवों के पास केन नदी की जलधारा में बालू पट्टा धारकों ने ह्यूम पाइप व बालू भरी बोरियां डालकर आर-पार पुल बना लिया है। इससे रात-दिन बालू भरे ट्रक गुजर रहे हैं। नदी के उस पार केन तट पर बालू खदान का पट्टा लखनऊ निवासी एक महिला के नाम है।
बताते हैं कि पट्टा धारक के रसूख सरकार तक हैं। इसी के चलते नदी पर पुल बना लिया गया। इस निर्माण पर क्षेत्रीय वनाधिकारी (बांदा वन प्रभाग) टीएन सिंह ने पुलिस को पत्र/तहरीर देकर कहा कि नदी को बांध कर अवैध रूप से पुल निर्माण किया गया है। पुल के नजदीक लगा हुआ वन क्षेत्र है।
इसके गाटा संख्या-4 में वन विभाग 47.553 हेक्टेयर का खातेदार है। सीमा से सटे वन क्षेत्र में सड़क या पुल निर्माण करने पर अब प्रतिबंध है। इसी तरह वन सीमा और उसके 100 मीटर तक खनन भी प्रतिबंधित है। वनाधिकारी ने यह भी लिखा है कि जहां यह पुल बनाया गया है वहां राज्य पक्षी सारस का प्राकृतिक वास है।
यहां खनन गतिविधियों से सारसों का प्राकृतिक वास नष्ट किया जा रहा है। यह वन संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत दंडनीय अपराध है। इस पर रोक लगाई जाए। वन क्षेत्राधिकारी का यह पत्र नक्कार खाने में तूती साबित हुआ। रसूखदार पट्टेदार की सत्ता में पहुंच के चलते यह पत्र पुलिस ने ठंडे बस्ते में डाल दिया।
उधर, दूसरी तरफ रसूख के चलते चित्रकूटधाम मंडल आयुक्त ने पीडब्ल्यूडी अधीक्षण अभियंता की संस्तुति की आड़ में अनधिकृत रूप से यह अस्थायी पुल/रास्ता बनाने की अनुमति दे दी है। हालांकि कुछ शर्तें लागू कर दी और ये भी ऐसी कि जिनका यहां कोई औचित्य नहीं है।
मसलन स्कूल, सार्वजनिक स्थल, श्मसान, कब्रिस्तान, मंदिर, मसजिद या अन्य धार्मिक स्थल न प्रभावित होने देने की शर्त रखी है। जाहिर है कि जंगल में यह स्थान नहीं होते। अनुमति की शर्त में यह भी शामिल है कि पुल पर कोई दुर्घटना या घटना होती है तो इसकी जिम्मेदारी व्यक्तिगत रूप से पट्टाधारक की होगी।
केंद्रीय जल आयोग के उप खंड अधिकारी अरविंद कुमार राय का कहना है कि
केन राष्ट्रीय नदी है। धारा रोकने पर जलस्तर का डाटा लेने में अवरोध
उत्पन्न होता है। स्थायी हो या अस्थायी पुल निर्माण के लिए केंद्र की
अनुमति जरूरी है। कच्चे रास्ते (पुल) की जानकारी केंद्रीय जल आयोग
मुख्यालय, आगरा मंडल को भेज दी गई है।
दूसरी ओर बांदा अपर जिलाधिकारी, डीएस पांडेय ने कहा कि पथरी घाट पर कुछ शर्तों के साथ मंडलायुक्त ने बालू ठेकेदारों को पुल/रास्ता बनाने की अनुमति दी थी। अब अगर वन विभाग ने कोई आपत्ति पत्र भेजा है तो इसका संज्ञान लिया जाएगा। पर्यावरण या कोई अन्य नुकसान है तो पुल को हटाया जाएगा।
उधर आरटीआई एक्टिविस्ट आशीष सागर का कहना है कि बक्छा (हमीरपुर घाट) में
मशीनें नदी की जलधारा से बालू निकाल रही हैं। वन क्षेत्र में खनन और जल
धारा को नुकसान पहुंचाना अपराध है, लेकिन बालू माफियाओं के संबंध सरकार के
मंत्रियों से हैं। इन्हीं के दबाव में मंडलायुक्त ने पुल की अनुमति दे दी।
वैसे भी बुंदेलखंड में वन्य जीवों की कमी है। ऐसी गतिविधियां उन्हें और
संकट में डाल रही हैं। पुल नहीं हटाया गया तो न्यायालय की शरण ली जाएगी।