बांदा। लॉकडाउन में मजदूरी और कारोबार बंद हो जाने से रोज खाने-कमाने वाले मजदूरपेशा व खेतिहर मजदूर पेट भरने के लिए महुआ के फूल का सहारा ले रहे हैं। महुआ का फूल वैसे भी गरीबों की भूख मिटाने का हमेशा से जरिया रहा है। कैथा, बेर, तेंदू आदि भी गरीबों की खुराक बने हुए हैं।
इन दिनों महुआ फूलने का मौसम है। पेड़ों तले तड़के महुआ के फूल गिरते हैं। खेतों और मुख्य सड़कों के किनारे यहां मध्य प्रदेश की सरहद पर कई गांवों में महुआ के पेड़ हैं। इन दिनों सुबह से ही ग्रामीण महिला-पुरुष और बच्चे फूल बीनने में जुट जाते हैं।
नरैनी में नदी किनारे बसा गढ़ा, शिवपुर, पाड़ादेव, भड़ेहा, बिल्हरका, रगौली, भटपुरा और मध्य प्रदेश में स्थित नेहरा, बछेड़ा खेरा, बरी खेड़ा आदि में यह नजारे रोज नजर आ रहे हैं। बिल्हरका गांव के राजकुमार ने बताया कि अधिकांश परिवारों का इन्हीं जंगली फलों पर गुजारा हो रहा है। यहां महुआ फूल के साथ कैथा और बेर पर्याप्त हैं। गढ़ा गांव के बाहर पुरवा में बब्बू केवट अपनी पत्नी कौसी और नातिन ज्योति के साथ रोजाना महुआ के फूल बीनकर रख रहा है। वह भूमिहीन है। बताया कि पिछले माह से काम नहीं मिल रहा। ऐसे में महुआ, कैथा आदि से ही पेट भर रहा है।