मंगल यात्रा की कामना, लेकिन टूटे शीशों का सामना। रोडवेज बसाें की यही है हकीकत। मेंटीनेंस पर छह करोड़ सालाना खर्च करने के बाद भी ज्यादातर बसाें मेें शीशे टूटे और सीटें फटी हैं। टीन के टुकड़े यात्रियों को जख्मी कर देते हैं। ठंड में चारों तरफ से खुलीं यह बसें ‘हवा महल’ से कम नहीं हैं।
चित्रकूटधाम मंडल के बांदा डिपो में 89, महोबा में 84, हमीरपुर में 47 और राठ डिपो में 67 बसे हैं। 287 बसों के बेड़े में इसी साल 38 बसें नई शामिल हुई हैं। 22 बसें अनुबंधित हैं। हरेक बस में चढ़ते ही मोटे अक्षरों से लिखा नजर आता है कि ‘आपकी यात्रा मंगलमय हो’, लेकिन सीट पर बैठने के बाद हर क्षण ‘अमंगल’ की आशंका मंडराती रहती है। सीज फायर व फर्स्टएड बाक्स तो दूर, खिड़की के शीशे तक गायब हैं। रोडवेज के फोरमैन ने बताया कि 12 नई रोडवेज बसों में ही फर्स्टएड और सीज फायर व शीशों की फुलप्रूफ व्यवस्था है।
जाड़े में सभी शीशे व खिड़कियां दुरुस्त करने का आदेश है। परिवहन निगम बसों के मेंटीनेंस में सालाना छह करोड़ रुपये खर्च करता है। मरम्मत के लिए 80 लाख का सामान यहीं लोकल स्तर पर खरीदा जाता है। उधर, एआरएम महेश प्रसाद का दावा है कि यहां की सभी 87 बसें पूरी तरह दुरुस्त हैं।
क्षेत्रीय प्रबंधक डीवी सिंह, परिवहन निगम, कहते हैं-47 बसें रिजेक्ट हुई थीं। इन्हें नीलाम कर दिया गया है। 15 दिसंबर तक सभी बसों में टूटे शीशे हटाकर नए लगा दिए जाएंगे। साथ ही जाड़े में हादसों से बचने के लिए सभी बसों में आल वेदर बल्ब, रिफलेक्टिव टेप, कैट आई लगा दिए जाएंगे