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बुंदेली किसान का चना की ओर रुझान, गेहूं गिरा

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बांदा। बुंदेलखंड में किसान नफा-नुकसान के आधार पर परंपरागत खेती को नए रुख पर मोड़ रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में रबी और खरीफ की फसलों का आकलन यही बता रहा है। सबसे ज्यादा खपत वाली मुख्य फसल गेहूं की खेती में गिरावट आ रही है और इसके विपरीत चना चमक रहा है।
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मौसम में साल-दर-साल आए बदलाव और दैवी आपदाओं की मार से खेती भी नया मोड़ ले रही है। कृषि विभाग के पिछले पांच सालों के आंकड़ों से यह बात सामने आई है कि मुख्य फसल गेहूं का दायरा सिमट रहा है। इसके विपरीत चने की खेती के प्रति रुझान बढ़ रहा है। कुछ चुनिंदा किसानों की दलील है कि चने के भाव ज्यादा मिलते हैं। इसकी खेती और कटाई आदि में झंझट कम है। गेहूं की खरीद ज्यादातर सरकारी केंद्रों में निर्धारित भाव पर होती है, जबकि चना खुले बाजार में ज्यादा दामों पर बिकता है।
पिछले पांच वर्षों में गेहूं की बुवाई का रकबा (हेक्टेयर में) और उत्पादन (मीट्रिक टन में) -
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वर्ष बुवाई उत्पादन
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2016-17 1,97,157 4,62,309
2017-18 1,58,943 3,63,699
2018-19 1,59,768 4,89,299
2019-20 1,61,384 4,61,299
2020-21 1,61,937 4,54,602
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पिछले पांच वर्षों में चना की बुवाई का रकबा (हेक्टेयर में) और उत्पादन (मीट्रिक टन में)-
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वर्ष बुवाई उत्पादन
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2016-17 57,549 48,200
2017-18 96,314 87,395
2018-19 91,110 1,08,270
2019-20 94,201 1,24,380
2020-21 94,201 1,10,909
गेहूं 7707 मीट्रिक टन घटा, चना 36,652 मीट्रिक टन बढ़ा
पिछले पांच वर्षों में गेहूं का बुवाई 35,220 हेक्टेयर घटा है। 2016-17 में यह 1,97,157 हेक्टेयर था। पिछले वर्ष 1,61,937 हेक्टेयर रह गया। उत्पादन 2016-17 में 4,62,309 मीट्रिक टन था। अब पिछले साल 4,54,602 मीट्रिक टन रह गया। इसी तरह चने का रकबा 2016-17 में 57,549 हेक्टेयर था। अब 94,201 हेक्टेयर हो गया है। चने का उत्पादन 48,200 मीट्रिक टन से बढ़कर 1,10,909 मीट्रिक टन हो गया है।
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फोटो-13बीएनडीपी - 9 : प्रेम सिंह।
ज्यादा फायदे वाली फसल अपनाना मजबूरी
बांदा। उत्तर प्रदेश किसान समृद्धि आयोग सदस्य और प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह (बड़ोखर खुर्द) का कहना है कि किसान जिस उपज में ज्यादा फायदा देखता है उसे ही अपनाता है। गेहूं के दायरे में कमी और चने में बढ़ोत्तरी के बारे में उनकी दलील है कि गेहूं की कटाई में काफी दिक्कत सामने आती है। जबकि चना समेत मसूर, अलसी, लाही के कटइया मजदूर आसानी से मिल जाते हैं। चूंकि गेहूं सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं में मजदूरों को मुफ्त या सस्ती दरों में मिल रहा है। इसलिए गेहूं के प्रति उनका ज्यादा रुझान नहीं है। चना काटने में वह ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं। गौरतलब है कि कटाई के बदले निर्धारित प्रतिशत की दर से अनाज ही दिया जाता है। बाजार में चने का भाव गेहूं से चार गुना ज्यादा है।
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