हिमालय पर्वत की रूप कुंड चोटी पर संदीप सिंह।
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बांदा। जोश और जज्बा हो तो हिमालय की चोटी भी चूमी जा सकती है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है यहां के युवा अध्यापक ने। कोई हमसफर नहीं मिला तो ‘एकला चलो’ मंत्र को अपनाते हुए हिमालय पर्वत का सफर शुरू कर दिया। 5030 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रूपकुंड झील की चढ़ाई पूरी कर ली।
शहर के अलीगंज (रामलीला ग्राउंड) निवासी और परिषदीय विद्यालय में प्रधानाध्यापक संदीप सिंह ने हाल ही में हिमालय पर्वत के शिखर तक का सफर किया है। गर्मियाें की छुट्टी में सैर सपाटे पर निकले संदीप ने बताया कि उन्होंने काफी समय से सुन रखा था कि हिमालय पर्वत की रूप कुंड झील अद्भुत और स्वप्न जैसी है। उन्होंने कुदरत के इस सौंदर्य को देखने की ठान ली।
एक जून को उन्होंने उत्तराखंड के चमोली जिले के लोहाजंग से अपनी यात्रा शुरू की। कोई साथी न होने के बाद भी जोश में कमी नहीं थी। बेहद चुनौती भरी यात्रा मेें उनके साथ स्लीपिंग बैग, स्लीपिंग टेंट, कुछ कपड़े और हाथ की छड़ी थी। दुश्वारियों और खतरों से भरा रास्ता छह दिन में पूरा किया।
82 किलोमीटर चढ़ाई चढ़ी। कई किलोमीटर तो सिर्फ बर्फ पर ही चलना पड़ा। तापमान शून्य से भी पांच डिग्री नीचे था। पहला पड़ाव 15 किलोमीटर के बाद वान गांव में हुआ। यह गांव रूपकुंड यात्रा मार्ग पर आखिरी गांव है, जो लगभग 2500 मीटर की ऊंचाई पर बसा है।
दूसरा पड़ाव विशाल हिमालयी चारागाह बेदनी बुग्याल में हुआ। यह वान गांव से 13 किलोमीटर आगे करीब 3657 मीटर की ऊंचाई पर है। ज्यादातर सफर दिन में पूरा किया। संदीप ने बताया कि ट्रैकिंग बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण रही। संदीप के पिता शिवबली सिंह कांग्रेस के पुराने और निष्ठावान पदाधिकारी हैं।