बांदा। बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल की चट्टानों में पाए गए दुर्लभ और हजारों वर्ष पुराने शैल चित्रों/रॉक पेंटिंग पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने भी मुहर लगा दी है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम ने तीन दिन तक बकस्वाहा के शैल चित्रों का सर्वे करने के बाद अपनी विस्तृत रिपोर्ट हाईकोर्ट को भेजी है। कहा कि यहां के सांस्कृतिक इतिहास में कोई कमी प्रतीत नहीं होती। शैल चित्र लंबे समय तक यहां मानव की उपस्थिति दर्शाते हैं।
मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के बकस्वाहा जंगल को हीरा खदान के लिए मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पट्टे पर दे दिए जाने से जंगल में 2.15 लाख से ज्यादा हरे पेड़-पौधे कटने के हालात पैदा हो गए हैं। इसका चौतरफा और देशव्यापी विरोध हो रहा है। लगातार आंदोलन जारी हैं। पर्यावरण पैरोकारों ने इसे एनजीटी और हाईकोर्ट के बाद यूएनओ (संयुक्त राष्ट्र संघ) तक पहुुंचा दिया है। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच अध्यक्ष और पर्यावरण पैरोकार अधिवक्ता डॉ. पीजी नाजपांडे (दिल्ली) ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर मुख्य बेंच में हाल ही इस मुद्दे पर रिट पिटीशन दाखिल की थी। कहा था कि हीरा खनन से बकस्वाहा जंगल में लाखों पेड़-पौधों के अलावा लगभग 25 हजार वर्ष पुराने पाषाण युग के शैल चित्र भी नष्ट हाेंगे।
मांग की कि इसे पुरातात्विक संपदा घोषित किया जाए। रिट पर सुनवाई के बाद 16 जुलाई को हाईकोर्ट की मुख्य बेंच ने केंद्र सरकार, मध्य प्रदेश सरकार और पुरातत्व विभाग से जवाब तलब करते हुए रिपोर्ट मांगी थी। हाईकोर्ट के आदेशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), जबलपुर मंडल की टीम ने अधीक्षण पुरातत्वविद सुजीत नयन के नेतृत्व में 10 से 12 जुलाई तक बकस्वाहा जंगल के शैल चित्रों का सर्वे किया। टीम में सहायक अधीक्षण पुरातत्वविद कमलकांत वर्मा, ड्राफ्टमैन सुरेंद्र सिंह बिष्ट और शिवम दुबे शामिल रहे। सघन सर्वे के बाद टीम ने अपनी 46 पृष्ठीय रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करने के लिए अधिवक्ता प्रभात कुमार यादव को सौंप दी है। सर्वे रिपोर्ट में बकस्वाहा जंगल के शैल चित्रों आदि के 50 फोटो भी हैं।
रिट दायरकर्ता डॉ. नाजपांडे ने बताया कि रिपोर्ट में कहा गया कि यहां तीन स्थानों पर इतिहास पूर्व की (प्री-हिस्टोरिक) रॉक पेंटिंग्स पाई गईं हैं। इनमें कुछ पेंटिंग पाषाण युग के मध्य काल की हैं। कुछ मानव इतिहास (हिस्टोरिक) समय की हैं। इसमें युद्ध के चित्र उकेरे गए हैं। इसके अलावा बकस्वाहा क्षेत्र के कुशमार गांव में सती पाषाण मूर्ति सहित अन्य मूर्तियां मिलीं हैं। (संवाद)
12वीं शताब्दी का लेख भी मिला
एएसआई की सर्वे रिपोर्ट में कहा गया कि बकस्वाहा से 10 किमी दूर कुशमार गांव में सूर्य, चंद्र, शिवलिंगम की जोड़ी, सती प्रथा को दर्शाती मूर्ति और देवनागरी लिपी में खुदा हुआ लेख पाया गया है। यह 11-12वीं शताब्दी का है। 25 किमी दूर उतारिया नाले में काले रंग की रॉक पेंटिंग्स मेसोलिथिक काल की है। यहां अधिकतर चित्र नष्ट कर दिए गए हैं। यहां पहुंचने के लिए करीब 10 किलोमीटर पैदल चलना होता है।
लंबे समय तक नहीं रही मनुष्य की उपस्थिति
सर्वे रिपोर्ट में एएसआई ने कहा कि पुरातात्विक महत्व की साइट्स बकस्वाहा के चारों तरफ 15 किलोमीटर दायरे में फैली हुई है। नदी के दाहिने तरफ 100 फीट ऊंची प्राकृतिक रॉक शेल्टर में जंगली जानवरों की हड्डियां मिली हैं। प्रतीत होता है कि यहां मनुष्य का आना-जाना या रहना नहीं रहा।
मेसोलिथिक काल के हैं कई शैल चित्र
पुरातत्व विभाग की सर्वे रिपोर्ट में यह भी शामिल है कि बकस्वाहा के ज्यादातर शैल चित्र ईसा पूर्व 8 हजार से 10 हजार वर्ष पुराने मेसोलिथिक काल के हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां लंबे अरसे तक मनुष्य की उपस्थिति रही है। पुरातत्व विभाग का कहना है कि यहां सांस्कृतिक इतिहास में कोई कमी प्रतीत नहीं होती। चित्रों में उस समय के हथियारों और अन्य सजावटी चित्रों की भरमार है।
दुनियां में पहचान बना सकते हैं शैल चित्र
इंटेक चेप्टर के बांदा संयोजक और शैल चित्रों पर पिछले डेढ़ दशक से कार्य कर रहे हारिस जमा खां का कहना है कि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने बहुत ही प्रभावी और वस्तु स्थिति से भरपूर सर्वे रिपोर्ट दी है। कहा कि बकस्वाहा के शैल चित्र बेहद दुर्लभ हैं। यह बुंदेलखंड की पहचान दुनियां में स्थापित कर सकते हैं। इस सांस्कृतिक धरोहर की हर हाल में सुरक्षा होनी चाहिए।
ASI seal on Bakaswaha's rock paintings- फोटो : BANDA