करतल (बांदा)। यूपी की सीमा में बसे चित्रकूटधाम मंडल के गांवों के ग्रामीण इन दिनों मध्यप्रदेश के घुसपैठी अन्ना मवेशियों से बुरी तरह से परेशान हैं। एमपी की सीमा के गांवों से इन मवेशियों को यूपी की तरफ अक्सर वहां के किसान हांक देते हैं।
ये अन्ना मवेशी राताें रात यूपी के किसानों की सैकड़ाें बीघा फसल चट कर जाते हैं, जिससे किसानों में आक्रोश भी व्याप्त हो रखा है। कहा जाए तो इन दिनों यूपी-एमपी की सीमा पर अन्ना पशुओं की हालत घुसपैठियों जैसी हो गई है। सीमावर्ती किसान इन्हें आए दिन एक-दूसरे की सरहदों में खदेड़ रहे हैं।
पिछले सप्ताह तकरीबन 500 से ज्यादा अन्ना गायों के हुजूम को यूपी (बांदा) के किसानों ने मध्यप्रदेश के गांवों में खदेड़ दिया था। इसके बाद अन्ना गायों ने वहां पर जमकर कहर ढाया तो मध्यप्रदेश के किसानों ने फिर उत्तर प्रदेश के चित्रकूटधाम मंडल के सीमावर्ती के गांवों में खदेड़ दिया है। अब यहां बड़ी संख्या में मध्यप्रदेश से घुसपैठ कर आईं अन्ना गायें घूम-घूमकर किसानों की सैकड़ों बीघा फसलें चौपट कर रही हैं। बुधवार को सीमावर्ती मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की घाटी से बड़ी संख्या में अन्ना गायों को वहां के ग्रामीणों ने यूपी के महाराजपुर चौकी के रास्ते से बांदा की सीमा में खदेड़ दिया है। इन गायों का झुंड करतल की ओर बढ़ रहा है।
यूपी के किसान इन्हें रोक रहे हैं। करतल सहित बांदा जिले के बिल्हरका, नहरी, पुंगरी, पुकारी, खलारी, कनाय, महाराजपुर, रगौली और अकेलवा आदि गांवों में अन्ना गायें फसलों को भारी नुकसान पहुंचाती रहती हैं। इन्हीं गांवों के किसानों ने कुछ दिन पूर्व भी इन गायों को पन्ना (एमपी) में खदेड़ दिया था। बुआई के बाद किसानों ने फसलें बचाने के लिए अन्ना गायों को यहां दाखिल होने से रोकने की नाकाबंदी शुरू कर दी है। करतल न्याय पंचायत में गोशाला भी बंद पड़ी है। सीमावर्ती गांवों में अन्ना गायों की भरमार है। गो आश्रय केंद्र जैसी व्यवस्थाएं भी यहां फ्लाप हैं।
सीमावर्ती किसानों में टकराव के हालात
अन्ना मवेशी सीमावर्ती किसानों के आपसी रिश्तों में भी रोड़ा बन रहे हैं। इन्हें लेकर दोनों सूबों के किसानों में टकराव की नौबत आ सकती है। ऐसी कुछ घटनाएं हो भी चुकी हैं। पिछले हफ्ते मध्यप्रदेश के रामनई गांव से वहां के किसान अन्ना गायों का झुंड लेकर नहरी (बांदा, यूपी) की तरफ लेकर बढ़ रहे थे। भनक लगते नहरी, पुंगरी, बिल्हरका आदि गांवों के किसान आ गए और मोर्चा संभाल लिया।
तनातनी की स्थिति पैदा हो गई। दोनों तरफ के गांवों के प्रधानों ने समझा-बुझाकर किसी तरह से मामला शांत कराया। इसी तरह पिछले वर्ष जुलाई में यूपी के शेखनपुर, मानपुर, पुकारी और खलारी गांवों के किसान अन्ना पशुओं का झुंड हांककर एमपी की तरफ जा रहे थे, तभी वहां के देवगांव, अजयगढ़ और बीरा के किसान विरोध में सामने आ गए थे और खासा विवाद भी हुआ था।
किसानों के लिए काल बनी अन्ना गायें
बिल्हरका (बांदा) के किसान महेश पाल, महाराजपुर के नत्थू अहिरवार और पुंगरी के रामऔतार ने बताया कि अन्ना गायें उनकी खेती के लिए काल बन रही हैं। तीनों किसानों की लगभग 35 बीघा जमीन में बोई मूंग और तिली की फसल सफाचट कर दी। पिछले साल महाराजपुर के किसान नत्थू की छह बीघा फसल अन्ना गायों का भोजन बन गई। किसान महेश को दिल्ली जाकर मजदूरी करना पड़ी। कमोवेश यही हाल बिल्हरका के महेश पाल, खलारी के जयनारायण पटेल आदि ने भी बताया।
इंसेट---
यूपी-एमपी के बुंदेलखंड में अन्ना प्रथा एक जैसी
यूपी-एमपी में बंटे बुंदेलखंड में प्राकृतिक और अन्ना पशु समस्याएं एक जैसी हैं। यूपी के साथ और एमपी के 10 जनपद बुंदेलखंड में शामिल हैं। यहां फसलें पर्याप्त न होने से पिछले दो दशकों में अन्ना प्रथा को काफी बढ़ावा मिला है। बांदा जिले का नरैनी क्षेत्र मध्य प्रदेश के पन्ना, सतना सरहदों से जुड़ा है। दोनों राज्यों के सीमावर्ती खेत जुड़े हुए हैं। ऐसे में अन्ना गायों का यूपी से एमपी और एमपी से यूपी में विचरण आम बात है। महोबा की सीमा भी एमपी से जुड़ी है। पिछले वर्ष वहां के किसानों ने हजारों अन्ना गायें बांदा के मटौंध क्षेत्र में छोड़ दी। मटौंध क्षेत्र के किसानों ने इन गायों को हांक कर नरैनी के रास्ते एमपी की सीमा में दाखिल कर आए थे। हालांकि, कुछ ही दिन एमपी के किसानों ने इन गायों को यूपी की तरफ खदेड़ दिया
चित्रकूटधाम मंडल में 75 हजार अन्ना पशु
15 लाख से ज्यादा गोवंश हैं। इनमें आधे से अधिक अन्ना गायों की संख्या है। 19वीं पशु गणना के मुताबिक, मंडल के चारों जनपदों में लगभग 75 हजार अन्ना पशु हैं। इनकी संख्या में साल-दर-साल वृद्धि हो रही है। सबसे ज्यादा लगभग 25 हजार अन्ना पशु बांदा जिले में हैं। चित्रकूट में 20 हजार, हमीरपुर में साढ़े 13 हजार, महोबा में साढ़े 17 हजार अन्ना पशु हैं। पिछले 5 वर्षों में मंडल में अन्ना पशुओं की संख्या में 46 हजार से ज्यादा का इजाफा हुआ है।
अभिलेखों में चारागाह, मौके पर नदारद
चारागाह घट रहे और अन्ना गायें बढ़ रही हैं। राजस्व विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, बांदा में जितने गांव हैं उससे दोगुने चारागाह हैं, पर धरातल पर अधिकांश नदारद हैं। जनपद में 951 चारागाह (पशुचर) हैं। इनका क्षेत्रफल 189 हेक्टेयर दर्ज है, जबकि जिले में ग्राम पंचायतें 471 हैं। यानी हर गांव में दो चारागाह होनी चाहिए। अवैध कब्जों और भूमि अभिलेखों में हेराफेरी से चारागाह मिट चुके हैं। चारागाहों का क्षेत्रफल एक हेक्टेयर से 10 हेक्टेयर तक है, पर इस सच्चाई को राजस्व विभाग नहीं स्वीकारता। उसके अभिलेखों में चारागाह बरकरार है।
दो सैकड़ा से ज्यादा गोशाला, एक अरब सालाना व्यय
पशुपालन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि बांदा में अस्थायी और स्थायी गोशालाओं की बड़ी तादाद है। इन पर प्रतिवर्ष एक अरब रुपये खर्च हो रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, 180 स्थायी गोशाला, चार कान्हा गोशाला, छह बेसहारा पशु आश्रय स्थल, चार वन विहार वृहद गोशाला, चार जिला पंचायत द्वारा संचालित गो सेवा सदन, चार विधायक निधि से संचालित स्थायी पशु आश्रय स्थल और चार प्राइवेट गो सेवा सदन स्थापित हैं।
‘चारागाहों पर अवैध कब्जों की कोई सूचना नहीं है। जब शिकायत आती है तो चारागाहों से अवैध कब्जे हटवा दिए जाते हैं। चारागाह जमीदारी एक्ट 132 में शामिल है। इसमें न तो कब्जा हो सकता, न आवंटन।’
-संतोष बहादुर सिंह, अपर जिलाधिकारी, बांदा