बांदा। बुढ़ापे में जब आराम की ज्यादा जरूरत होती है तो जीने का सहारा बनी पेंशन पाने के लिए खुद को ‘जिंदा’ साबित करने के लिए हर साल बुजुर्गों को जहमत उठानी पड़ती है। नवंबर-दिसंबर में ऐसे बुजुर्गों को ट्रेजरी में हाजिरी देनी पड़ती है। हाजिरी देने के लिए ट्रेजरी तक आना और फिर वापस जाना इनके लिए किसी यातना से कम नहीं है। इन बुजुर्गों का कहना है कि अगर सरकार उनकी शारीरिक परेशानियों और वृद्धावस्था की मजबूरियों को समझते हुए घर बैठे सत्यापन की व्यवस्था कर दे तो उन्हें बड़ी राहत मिल जाएगी।
गौरतलब है कि जनपद में 6800 पेंशनर हैं। इनमें सिविल रक्षा, सैन्य, रेलवे, राजनीतिक, शिक्षा विभागों के अलावा कुछ पेंशनर दूसरे प्रांतों के भी हैं। इन्हें हर माह लगभग छह करोड़ रुपया पेंशन के रूप में बांटा जाता है। कई वर्षों से पेंशन बैंकों के जरिए मिल रही है। पेंशनरों को कोषागार नहीं आना पड़ता। अपनी सहूलियत के मुताबिक किसी भी दिन बैंक जाकर या किसी अन्य को भेजकर चेक के जरिए पेंशनर अपनी पेंशन हासिल कर लेते हैं लेकिन नवंबर आते ही इन्हें हर साल अपने को जिंदा साबित करने के लिए कोषाधिकारी के सामने पेश होना पड़ता है। ऐसा न करने पर उनकी पेंशन रोक दी जाती है। इसी वजह से शारीरिक दिक्कतें झेलने के बावजूद उन्हें कोषागार आना पड़ता है।
पुलिस से रिटायर हुए 90 वर्षीय हाफिज अली (अलीगंज) पेंशन के लिए शनिवार को अपने जीवित होने का सुबूत देने पुत्र हामिद के साथ पहुंचे। खस्ताहाल सड़कों पर रिक्शे पर लगे धक्कों ने उनकी हालत पस्त कर दी। बोले- हम जैसे लाचारों के सत्यापन की घर बैठे व्यवस्था होनी चाहिए। इसी प्रकार 77 वर्षीय दीनदयाल गुप्त कृषि विभाग से सेवानिवृत्त हुए हैं। चलने-फिरने से मोहताज हैं। पुत्र आनंद कुमार के सहारे वह कोषागार आ सके। इस बीच तबियत बिगड़ते-बिगड़ते बची। स्वराज कालोनी निवासी शिक्षक रहे 75 वर्षीय बजरंग बहादुर और 72 वर्षीय पत्नी कुसुम कुमारी श्रीवास्तव पति-पत्नी हैं। दोनों एक-दूसरे को सहारा देकर किसी तरह कोषागार आए।
इसी तरह 87 वर्षीय रामदेवी, 72 वर्षीय गुलबदन यादव, 64 वर्षीय गया प्रसाद और 62 वर्षीय पेंशनर गजराज निषाद को भी जिंदगी का सुबूत देने कोषागार तक आने में भारी तकलीफें उठानी पड़ीं। इन सभी ने अपनी परेशानियों को साझा करते हुए घर बैठे सत्यापन की मांग की।