बांदा। मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों इलाज किया।
एचआईवी के बारे में यहां कुछ ऐसा ही है। सरकार से लेकर तमाम स्वयंसेवी
संगठन एड्स से बचाव की मुहिम में हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं।
बाकायदा
विभाग खुला हुआ है। पर इस मर्ज पर लगाम नहीं लग रही। हर साल मरीज बढ़ रहे
हैं। वर्ष 2015 के 11 महीनों में 55 लोग एचआईवी की चपेट में और आ चुके हैं।
यहां की एआरटी में 237 एचआईवी पीड़ितों का इलाज किया जा रहा है।
बुंदेलखंड में भी एचआईवी तेजी से बढ़ रहा है। मजदूरी के लिए महानगरों को पलायन करने वाले लोग यह जानलेवा मर्ज साथ लेकर आ रहे हैं।
वर्ष
2013 में जिला अस्पताल में जांच पड़ताल के दौरान 49 एचआईवी पाजिटिव पाए गए
थे। पिछले वर्ष 2014 में लगभग दो दर्जन नए मरीज मिले। मरीजों का इलाज
कानपुर में होता था। बांदा में इलाज की व्यवस्था नहीं थी।
इस वर्ष
फरवरी में बांदा में भी एंटी रेट्रोवायरल थ्योरेपी (एआरटी) स्थापित हो गई
है। जिला अस्पताल में चल रही इस यूनिट में एचआईवी पीड़ितों का इलाज हो रहा
है।
11 माह में 55 नए मरीजों समेत यहां 237 मरीज पंजीकृत हो चुके
हैं। इनमेें 145 पुरुष और 92 महिलाएं हैं। हर माह लगभग चार सौ से ज्यादा
लोगों की जांच होती है।
जिला अस्पताल के ब्लड बैंक प्रभारी डा. एसके
वाजपेई ने बताया कि शासन द्वारा प्रदेश में घोषित पांच हाई रिस्क जनपदों
में बांदा भी शामिल है।
ब्लाकवार घोषित हाई रिस्क जोन में बबेरू
प्रथम, नरैनी द्वितीय और कमासिन क्षेत्र तृतीय स्थान पर है। उन्होंने बताया
कि बबेरू और नरैनी क्षेत्र से ज्यादा लोग महानगरों को पलायन कर रहे हैं।
बांदा
जनपद में एड्स का शिकंजा काफी खतरनाक रूप ले रहा है। एड्स की चपेट में आकर
मरने वालों की संख्या जनपद में लगभग 47 हो चुकी हैं। इनमें 10 महिलाएं भी
हैं। बांदा में एड्स नियंत्रण सोसायटी का गठन वर्ष 2008 में हुआ था।