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बुंदेलखंड में मौत बांट रहे 345 क्रेशर

Mon, 30 May 2016 12:13 AM IST
ब्यूरो अमर उजाला, बांदा
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पहाड़ों में विस्फोट के बाद बड़े टुकड़ों को तोड़ते मजदूर। - फोटो : अमर उजाला
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चट्टान का धमाका प्राण ले या क्रेशर की धूल। पहाड़ों और क्रेशरों में काम करने वाले मजदूरों और आसपास आबाद लोगों पर अक्सर यही बीतती है। सावधानी बरत कर चट्टानों के विस्फोट से बचे रहे तो भी ‘सिलकासिस’ रोग नहीं बख्शता। बुंदेलखंड में 1311 खनन क्षेत्रों और लगभग साढ़े तीन सैकड़ा क्रेशरों ने यही हालात पैदा कर रखे हैं।
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बुंदेलखंड के सातों जनपदों में लगभग 1311 खनन क्षेत्र हैं। प्रदेश सरकार को हर साल लगभग पांच अरब 10 करोड़ रुपये राजस्व के रूप में खनन क्षेत्रों से मिलता है। सरकार से ज्यादा पट्टा धारकों की कमाई होती है। लेकिन मजदूरों के हिस्से में रात-दिन पत्थर तोड़ने जैसी मशक्कत के बाद भी तंगहाल जिंदगी या मौत आती है।

खनन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा 349 क्षेत्र झांसी जनपद में हैं। महोबा में 330, बांदा में 190, चित्रकूट में 141, जालौन में 89, हमीरपुर में 83 और ललितपुर में 129 खनन क्षेत्र हैं। यह आंकड़े जन सूचना अधिकार अधिनियम से मिले हैं। इसी तरह सातों जनपदों में 345 क्रेशर हैं। महोबा में सबसे ज्यादा 39 स्टोन खान (पत्थर खदान) बताई गईं हैं।
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इनमें कई पट्टे राजनीतिक दलों से जुड़े ‘माननीयों’ के भी हैं। कानून की कसौटी पर कसा जाए तो उनमें से कोई भी पहाड़ पट्टा धारक या क्रेशर स्वामी नियम-कानूनों और शर्तों पर अमल नहीं कर रहा। यही उल्लंघन मजदूरों और आसपास के लोगों की मौत या बीमारी की वजह बन रहा है।

‘सिलकासिस’ पीड़ितों का सर्वे और इस क्षेत्र में काम कर रहे डा.घनश्याम (महोबा/छतरपुर) बताते हैं कि इस रोग के पीड़ित मजदूरों की अच्छी खासी तादाद है। वरिष्ठ चिकित्सक डा.मोहम्मद रफीक (एमडी) बताते हैं कि ‘सिलकासिस’ बीमारी पत्थरों की डस्ट से पैदा होती है।

इसका सीधा दुष्प्रभाव फेफड़ों पर होता है। इस बीमारी कुछ लक्षण टीबी से मिलते-जुलते है। हालांकि इसके कीटाणु टीबी जैसे नहीं होते। खांसी, बुखार, सांस फूलना, वजन घटना, भूख न लगना इत्यादि इसके लक्षण हैं। समय से इलाज न किया गया तो फेफड़े बेकार हो जाते हैं। फिर उनकी रिकवरी नहीं हो पाती। ऐसे में जान भी जा सकती है।
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