बांदा। कोरोना की पाबंदी और बंदिशों ने लगभग 270 वर्ष से मोहर्रम पर चली आ रही ढाल सवारी, ताजियेदारी आदि की परंपरा को रोक दिया। मोहर्रम मनाने वाले अपनी आस्था सड़कों पर प्रदर्शित नहीं कर पा रहे।
बुधवार को मोहर्रम की छठवीं थी, लेकिन सदियों से इस दिन कोतवाली के सामने सदियों से चली आ रही ताजिया मिलाप की परंपरा भी नहीं हो पाई। सभी इमामबाडे़ सूने पडे़ हैं। ढोल ताशे खामोश हैं।
बुंदेलखंड और खासकर बांदा का मोहर्रम पूरे देश से निराला है। यहां जैसे आयोजन शायद ही कहीं होते हों। मोहर्रम का चांद नजर आते ही पहली से दसवीं तारीखों तक रोजाना कुछ न कुछ होता चला आ रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि साल में इकलौता मौका होता है, जिसमें सांप्रदायिक सौहार्द और हिंदू-मुस्लिम एकता का बेमिसाल नजारा नजर आता है।
सभी आयोजनों में बड़ी संख्या में मुस्लिमों के साथ हिंदू धर्म के लोग भागीदारी करते हैं। बांदा में मोहर्रम पर ढाल सवारी की शुरुआत साल 1750 ईस्वीं में पुणे (महाराष्ट्र) के मराठा ठाकुर रामा जी ने की थी। तब से आज तक लगातार अलीगंज में उनके द्वारा स्थापित इमामबाड़ा बरकरार है। उनके वंशज इस परंपरा को बरकरार रखे हैं।
करीब 270 वर्षों के बाद यह पहला अवसर है जब रामा का इमामबाड़ा मोहर्रम में भी सूना है। मुख्य गेट बंद है। सभी इमामबाड़ों में भी सिर्फ ढाल सवारी सजा दी गई हैं। इन्हें सड़कों पर नहीं लाया जा रहा। न ही भीड़भाड़ और ढोल ताशे की गूंज है।
मोहर्रम के छह दिन सन्नाटे में बीत चुके हैं। मोहर्रम कमेटी अध्यक्ष अब्दुल वहीद ने बताया कि कोरोना संक्रमण के चलते प्रदेश सरकार और प्रशासन द्वारा जारी गाइड लाइन के मुताबिक कोई सार्वजनिक आयोजन नहीं किए जा रहे हैं।
धार्मिक से ज्यादा सौहार्द का नमूना है मोहर्रम
मोहर्रम पर ताजिया, ढाल सवारी, अलम, अलाव, मेला मिलाप इत्यादि आयोजन मुस्लिम धर्मगुरुओं के नजरिये से गैर धार्मिक हैं, लेकिन बुंदेलखंड मेें मोहर्रम के 10 दिवसीय परंपरागत आयोजन हिंदू-मुस्लिम सौहार्द और एकता को लगातार मजबूत करते रहे हैं।
बांदा शहर का सबसे प्राचीन रामा का इमामबाड़ा हिंदू-मुस्लिम एकता का सबसे बड़ा प्रतीक है। मोहर्रम के सभी कार्यक्रमों में हिंदू मुस्लिम की भागीदारी रहती है। कई इमामबाडे़ हिंदू अकीदतमंदों के नाम से चल रहे हैं। ताजिया आदि के जुलूसों में लंगर लुटाने में भी अन्य धर्म के लोग शामिल हैं।