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सोहेलवा सेंक्चुरी के संरक्षण व संवर्धन का मुद्दा हाशिए पर

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बलरामपुर। जिले की नेपाल सीमा से सटे सोहेलवा सेंचुरी के संरक्षण व संवर्धन का मुद्दा पूरी तरह हाशिए पर है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि जैव विविधता से परिपूर्ण इस प्राकृतिक संपदा को बचाने की जरूरत जताते हुए प्राय: हर चुनाव में राजनेता बड़े बड़े दावे तो करते हैं लेकिन चुनाव बाद यह वादे ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।
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सेंक्चुरी से सटे गांवों में जंगली जानवरों का आए दिन होने वाला हमला भी क्षेत्रीय लोगों के लिए एक बड़ी परेशानी बना है। लोगों का कहना है कि लगातार हो रही अवैध कटान पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए सरकार के साथ ही क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को भी खुद आगे आना चाहिए। ताकि सेंक्चुरी की सुरक्षा में जुटे वन विभाग को आधुनिक संसाधनों से लैस किया जा सके।
लगभग 452 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में स्थित सोहेलवा सेंक्चुरी प्राकृतिक संपदा व जैव विविधता की नायाब धरोहर है। स्थायी वन माफियाओं के साथ-साथ खुली सीमा के कारण नेपाल के साथ ही क्षेत्रीय स्तर पर सक्रिय वन माफियाओं की कुदृष्टि रहती है। रोकथाम न होने से अवैध कटान जोरों पर है। इसके चलते जंगल क्षेत्र का वजूद तेजी से सिमटने लगा है।
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आजादी के 75 वर्ष बाद भी इस सेंक्चुरी को संरक्षित करने का कोई ठोस उपाय नहीं किया गया। वन माफियों के सिर पर रसूखदारों का हाथ रहने से इनकी धरपकड़ नहीं हो पाती। सेंक्चुरी की सुरक्षा में लगी वन विभाग की टीम भी पर्याप्त कर्मियों व संसाधनों की कमी से जूझ रही है जबकि वन माफिया संरक्षित वन संपदा का दोहन कर मालामाल हो रहे हैं।
वन विशेषज्ञ पाटेश्वरी प्रसाद सिंह का कहना है कि वर्ष 2011-12 में पुलिस तथा वन विभाग ने मिलकर जंगल को नष्ट करने वालों 71 वन माफियाओं की सूची तैयार की थी। इस सूची के माध्यम से वनमाफियाओं के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करने का प्लान भी बनाया गया था लेकिन अचानक इस सूची को रसूखदारों के दबाव के चलते ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
पर्यावरण विशेषज्ञ प्रो. नागेंद्र सिंह ने कहा कि सोहेलवा सेंक्चुरी जैसी प्राकृतिक संपदा को बचाने के लिए जिले के जनप्रतिनिधियों को पहला करनी होगी। जिले की अमूल्य धरोहर को बचाने के लिए शासन स्तर से प्रभावी कार्ययोजना तैयार किए जाने की जरूरत है। वन विभाग की जंगल की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कर्मी व संसाधन मुहैया कराना चाहिए।
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