जरवा। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित गांव मोहकमपुर में नेपाल की सुंगनती चौधरी थारू जनजाति की महिलाओं की जिंदगी संवार रहीं हैं। महिलाओं को आत्मनिर्भरता बनाने के लिए वह गांव के सचिवालय में उन्हें मूंज से बनने वाले उत्पाद तैयार करने में प्रशिक्षित कर रही हैं।
नेपाल की चर्चित प्रशिक्षिका सुंगनती ने बताया कि महिलाओं को मूंज और बनकस घास से विभिन्न आकर्षक और उपयोगी उत्पाद बनाना सिखा रहीं हैं। उनके हाथों से तैयार वस्तुएं भारत, नेपाल और अमेरिका तक निर्यात की जाती हैं। तैयार उत्पाद के कारोबार को और विस्तार देना है, इसके लिए प्रयास किया जा रहा है। प्रशिक्षण में करीब 25 महिलाएं शामिल हैं, जो घास से पूजा टोकरी, पेन बॉक्स, डलिया, मौनी डूगा, बड़िया, ढकिया, किसती, काकरी सेट और डिनर सेट जैसी वस्तुएं तैयार कर रही हैं।
महिलाएं कहती हैं कि यह कारीगरी इतनी सहज है कि बातचीत करते-करते भी वे उपयोगी वस्तुएं बना लेती हैं। सिर्फ मोहकमपुर ही नहीं, बल्कि आसपास के गांवों सगरापुर, पहाड़ापुर, कन्हैईडीह, बेतहनिया, बालापुर और नसीमडीह की महिलाएं भी प्रशिक्षण हासिल कर रही हैं। स्थानीय स्तर पर महिलाओं को पर्याप्त मात्रा में बनकस और मूंज घास उपलब्ध हो जाती है। (संवाद)
स्थानीय प्रशिक्षिकाएं भी निभा रहीं अहम भूमिका
प्रशिक्षण में नेपाल की प्रशिक्षिका के साथ-साथ स्थानीय प्रशिक्षिकाएं लक्ष्मी थारू और साध्वी थारू भी महिलाओं को सिखाने में सहयोग कर रही हैं। दोनों बहनों ने बताया कि मूंज क्राफ्ट की वस्तुएं जिले के उच्च अधिकारियों और पूर्व जिलाधिकारी की पत्नी तक को आकर्षित कर चुकी हैं। डॉ. महेंद्र कुमार की पत्नी ने एक बार करीब 16 हजार रुपये के मूंज उत्पादों की खरीदारी की थी। इन वस्तुओं को अब अमेजॉन और फ्लिपकार्ट जैसे ऑनलाइन प्लेटफाॅर्म पर भी बेचा जा रहा है, जिससे यह कला ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई ताकत बनकर उभर रही है। सूरज महिला स्वयं सहायता समूह की महिलाएं दुर्गावती और चांदनी ने बताया कि वह मूज क्राफ्ट के साथ-साथ सीनरी वॉल पेंटिंग भी बना रही हैं। जिनका अब तक लाखों रुपये का कारोबार हो चुका है।