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Balrampur News: मिलकर हो प्रयास तो बच्चों के बचपन को फिर मिले खुला आसमान

Mon, 27 Jul 2026 11:06 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
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फोटो-15-हिना खातून, खेल प्र​​शिक्षक
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बलरामपुर। विद्यालय केवल पुस्तकों और कक्षाओं से ही नहीं, बल्कि खेल मैदानों से भी बच्चों का सर्वांगीण विकास होता है। कभी गांवों के विद्यालयों में प्रार्थना के बाद कबड्डी, खो-खो, फुटबॉल और दौड़ की गूंज सुनाई देती थी, लेकिन अब जिले के अनेक विद्यालयों में खेल मैदान सिमटते जा रहे हैं। भवनों के विस्तार और भूमि के अन्य उपयोगों के कारण बच्चों के पास खुलकर खेलने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं बचा है।
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जिले के कई राजकीय और सहायता प्राप्त विद्यालय ऐसे हैं, जहां खेल मैदान या तो पर्याप्त नहीं हैं या पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं। इसका असर बच्चों की खेल गतिविधियों और शारीरिक विकास पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन, शिक्षा विभाग, पंचायत और समाज मिलकर इस समस्या का व्यावहारिक समाधान निकाल सकते हैं।

सबसे पहले सभी विद्यालयों की उपलब्ध भूमि का सर्वे कराया जाए। जिन विद्यालयों के पास पर्याप्त जमीन नहीं है, वहां ग्राम समाज, पंचायत अथवा अन्य सरकारी विभागों की खाली भूमि को खेल मैदान के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे विद्यालयों के साथ-साथ गांव के अन्य बच्चों को भी खेल सुविधाएं उपलब्ध होंगी।
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खिलाड़ी के लिए मैदान और माहौल दोनों जरूरी

खेल प्रशिक्षक हिना खातून का कहना है कि खेल मैदान बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की पहली प्रयोगशाला होते हैं। यहीं अनुशासन, नेतृत्व क्षमता, टीम भावना, आत्मविश्वास और हार-जीत को स्वीकार करने की सीख मिलती है। उनका सुझाव है कि प्रत्येक विकासखंड में आधुनिक सुविधाओं से युक्त साझा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स विकसित किए जाएं, जिनका उपयोग आसपास के कई विद्यालय समयबद्ध तरीके से कर सकें।

पंचायतों में विकसित हो सकते हैं मॉडल खेल मैदान

पूर्व खिलाड़ी रश्मि सिंह का कहना है कि पंचायतों और विभिन्न सरकारी विभागों के पास उपलब्ध खाली भूमि को चिह्नित कर खेल विभाग और शिक्षा विभाग संयुक्त रूप से मॉडल खेल मैदान विकसित कर सकते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों की खेल प्रतिभाओं को बेहतर अवसर मिलेंगे।

इच्छाशक्ति हो तो लौट सकते हैं खेल मैदान

सेवानिवृत्त राजकीय खेल शिक्षक राम नगीना यादव का कहना है कि जिन विद्यालयों के खेल मैदान अतिक्रमण या निर्माण की भेंट चढ़ गए हैं, उनका राजस्व अभिलेखों के आधार पर सत्यापन कराया जाना चाहिए। जहां संभव हो वहां मैदान पुनर्जीवित किए जाएं और अन्य स्थानों पर वैकल्पिक खेल परिसर विकसित हों। उन्होंने सीएसआर, बैंकों, सामाजिक संगठनों, पूर्व छात्रों और ग्राम पंचायतों की भागीदारी से रनिंग ट्रैक, कबड्डी, वॉलीबॉल और बास्केटबॉल कोर्ट जैसी सुविधाएं विकसित करने पर भी जोर दिया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी खेल आधारित शिक्षा पर विशेष बल देती है। ऐसे में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ सुरक्षित और पर्याप्त खेल मैदान उपलब्ध कराना समय की आवश्यकता है।

पांच व्यावहारिक सुझाव
पंचायत, ग्राम समाज और अन्य सरकारी विभागों की खाली भूमि को खेल मैदान के रूप में विकसित किया जाए।
प्रत्येक विकासखंड में साझा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स स्थापित किए जाएं।
सीएसआर, जनसहयोग और पूर्व छात्रों की भागीदारी से खेल सुविधाओं का विकास किया जाए।
पुराने खेल मैदानों का सर्वे कर अतिक्रमण हटाकर उनका पुनर्जीवन किया जाए।
शिक्षा, खेल, राजस्व और पंचायत विभाग मिलकर स्कूल खेल मैदान पुनर्जीवन योजना तैयार करें।

फोटो-15-हिना खातून, खेल प्रशिक्षक

फोटो-15-हिना खातून, खेल प्रशिक्षक

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