बलरामपुर।मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ने बीए हिंदी विषय के पाठ्यक्रम में देवीपाटन मंडल के साहित्य, संस्कृति और लोक परंपरा को प्रमुख स्थान दिया है। कुलपति प्रो. रवि शंकर सिंह की पहल पर तैयार यह नया पाठ्यक्रम छात्रों को गोंडा, बलरामपुर, श्रावस्ती और बहराइच जनपद की रचनात्मक धारा से जोड़ने का कार्य करेगा। विश्वविद्यालय का यह प्रयास न केवल हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों को स्थानीय संदर्भों की गहराई से परिचित कराएगा, बल्कि मंडलीय साहित्य के अध्ययन-अनुसंधान को भी राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाएगा। बीए हिंदी विषय के पांचवें सेमेस्टर के लिए निर्धारित यह पाठ्यक्रम “देवीपाटन मंडल का हिंदी साहित्य” शीर्षक से है।
मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ने स्नातक तृतीय वर्ष के हिंदी विषय के लिए नया पाठ्यक्रम तय किया है। इसमें विद्यार्थियों को स्थानीय साहित्यिक परंपरा से जोड़ने की खास पहल की गई है। देवीपाटन मंडल के गोंडा, बलरामपुर, बहराइच और श्रावस्ती जिलों की रचनात्मक विरासत को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है। इसका उद्देश्य छात्रों को अपने क्षेत्र की साहित्यिक चेतना, सांस्कृतिक धारा और रचनात्मक ऊर्जा से परिचित कराना है। हिंदी पाठ्यक्रम समिति के पूर्व संयोजक शैलेंद्र नाथ मिश्र ने बताया कि विद्यार्थी को देवीपाटन मंडल की साहित्यिक यात्रा से रूबरू कराया जाएगा। इसमें क्षेत्र के प्रमुख कवियों, लेखकों और पत्रकारों की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। महाकाव्य परंपरा के तहत गोस्वामी तुलसीदास के साथ ही स्थानीय कवि हीरासिंह ‘मधुर’, बाबू नानकचंद मिश्र, महात्मा बनारसीदास, ऋषिराम तिवारी ‘सरल’ आदि की रचनाओं को शामिल किया गया है। खंडकाव्य परंपरा में डॉ. सूर्यपाल सिंह और शिवकांत मिश्र ‘विरोधी’ जैसे कवियों की कृतियों पर अध्ययन होगा। साथ ही स्वामी नारायण और उनके जैन-बौद्ध साहित्य योगदान पर भी चर्चा कराई जाएगी।
काव्यधारा से लेकर आधुनिक गीत तक
विद्यार्थी को भक्ति, रीति और आधुनिक काव्य परंपरा से जोड़ा गया है। संत तुलसीदास की हनुमान चालीसा से लेकर कवि रामप्रसाद श्रीवास्तव का देशभक्ति गीत तक इसमें समाहित है। इसके साथ ही आधुनिक युग के कवियों पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, अदम गोंडवी, शांति प्रसाद मिश्र ‘मधुकर’, शिवनाथ मिश्र ‘विरोधी’ और अनंत मिश्र ‘विनोद’की रचनाओं को भी पढ़ाया जाएगा। इन कविताओं के माध्यम से छात्र न केवल काव्य की विविधता को समझेंगे, बल्कि सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना का अध्ययन भी करेंगे।
गद्य, आलोचना और व्यंग्य का संगम
पाठ्यक्रम में गद्य लेखन की समृद्ध परंपरा को जोड़ा गया है। बद्री नारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, गंगा प्रसाद श्रीवास्तव और महेंद्रनाथ पांडेय जैसे लेखकों के निबंध व व्यंग्य के साथ-साथ डॉ. सूर्यपाल सिंह का उपन्यास ‘कैमरे की डायरी’ भी अध्ययन में शामिल है। यह पाठ्यक्रम छात्रों को समकालीन लेखन, आलोचना और जनपदीय संस्कृति की समझ विकसित करने में मदद करेगा। विश्वविद्यालय वित्त समिति के सदस्य सर्वेश सिंह ने बताया कि कुलपति की दूरदर्शिता से विश्वविद्यालय के इस पाठ्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को यह समझाना है कि साहित्य केवल किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि अपने समाज, संस्कृति और परिवेश का प्रतिबिंब भी है। देवीपाटन मंडल के कवियों और लेखकों का अध्ययन करके छात्र यह अनुभव करेंगे कि स्थानीय सृजन कैसे राष्ट्रीय साहित्यिक धारा से जुड़ता है।