बलरामपुर। भारत-नेपाल दोहरी नागरिकता कांड की जांच अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित तकनीकी विश्लेषण के चरण में पहुंच गई है। 27 आरोपियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे की विवेचना में पुलिस हजारों सरकारी अभिलेखों, डिजिटल रिकॉर्ड और पहचान से जुड़े दस्तावेजों की एआई आधारित मैपिंग कर रही है। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि संबंधित व्यक्तियों की भारतीय पहचान का दस्तावेजी क्रम किस तरह तैयार हुआ, सबसे पहला रिकॉर्ड कौन-सा था और उसके आधार पर आगे कौन-कौन से सरकारी पहचान पत्र जारी हुए।
सूत्रों के अनुसार जांच एजेंसियों ने मतदाता सूची, आधार कार्ड, राशन कार्ड, निवास प्रमाणपत्र, परिवार रजिस्टर, जन्म संबंधी अभिलेख और अन्य सरकारी रिकॉर्ड जुटाए हैं। इन दस्तावेजों का डिजिटल विश्लेषण कर विभिन्न विभागों के रिकॉर्ड को आपस में जोड़ा जा रहा है। एआई आधारित सिस्टम की मदद से नाम, पता, जन्मतिथि, पारिवारिक विवरण, मोबाइल नंबर और दस्तावेजों में समय-समय पर हुए बदलाव का मिलान किया जा रहा है।
सूत्रों का कहना है कि जांच में करीब तीन दशक पुराने अभिलेखों को भी शामिल किया गया है। निर्वाचन, राजस्व, पूर्ति समेत अन्य विभागों के रिकॉर्ड का आपसी सत्यापन किया जा रहा है। सीमा क्षेत्र से जुड़े इस मामले में नेपाल के दांग जिले के कोईलाबास क्षेत्र से मिली सूचनाओं का भी भारतीय अभिलेखों के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया जा रहा है, जिससे दोनों देशों के रिकॉर्ड में समानता और अंतर का पता लगाया जा सके।
जांच अधिकारियों का मानना है कि इतने बड़े स्तर पर दस्तावेजों का मैनुअल मिलान करने में लंबा समय लग सकता था, लेकिन एआई आधारित विश्लेषण से प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और तेज किया जा रहा है। पुलिस अधीक्षक विकास कुमार ने बताया कि मामले की हर स्तर से जांच की जा रही है। दस्तावेजों के सत्यापन के साथ-साथ तकनीकी माध्यमों से भी जांच आगे बढ़ाई जा रही है। विवेचना में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।