रेहराबाजार। कंछर अशरफपुर की महिला कारीगर कलावती देवी ने पारंपरिक मिट्टी के बर्तन बनाकर अपनी तकदीर बदल दी है। कभी काम की तलाश में भटकने वाली कलावती देवी अब अपने हुनर के दम पर आत्मनिर्भर बनकर क्षेत्र में मिसाल पेश कर रही हैं।
करीब 10 वर्ष पहले उन्होंने अपने परंपरागत काम मिट्टी के बर्तन बनाना शुरू किया। शुरुआत में उन्होंने कलश, लौभुजनी, कुल्हड़, दीया, कोशा और मूर्तियां बनानी शुरू कीं। धीरे-धीरे मांग बढ़ने लगी तो उन्होंने अपने परिवार के सदस्य जगदंबा प्रसाद को भी इस काम में लगा दिया। दोनों मिलकर बर्तन तैयार कर बाजारों में सप्लाई करते हैं।
बिजली के चाक से आसान हुआ काम
कलावती देवी को विभाग की ओर से निशुल्क विद्युत चाक भी मिला है, जिससे कम समय में अधिक बर्तन तैयार हो जाते हैं और मेहनत भी कम लगती है। रेहराबाजार, बाबागंज, पेहर, हुसैनाबाद, सादुल्लाहनगर, घासीपोखरा सहित आसपास के गांवों व बाजारों से होटल संचालक वर्षभर कुल्हड़ खरीदने आते हैं।
10 हजार रुपये मासिक होती है आमदनी
कलावती देवी ने बताया कि चाय की दुकानों पर कुल्हड़ों की वर्ष भर मांग बनी रहती है। वहीं सहालग के मौसम में कलश, दीया, मटकी, कोसा आदि की बिक्री बढ़ जाती है। इससे उन्हें प्रत्येक माह लगभग 10 हजार रुपये की आय हो जाती है और साल भर में करीब 1.20 लाख रुपये की कमाई हो जाती है।