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यूपी में बसपा से चुनाव जीतने वाले इकलौते विधायक बोले- जाति-पाति के नाम पर बने संगठन भविष्य के लिए घातक  

Sat, 12 Mar 2022 12:43 AM IST
उत्पल कांत अमर उजाला नेटवर्क, बलिया
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रसड़ा विधायक उमाशंकर सिंह। - फोटो : अमर उजाला
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राजनीति में आए हालिया परिवर्तन चिंता जताने वाले हैं। देश व प्रदेश में जाति-पाति के नाम पर बने छोटे-छोटे संगठन व पार्टियां भविष्य के लिए घातक साबित हो सकती हैं। ये बातें प्रदेश में बसपा से चुनाव जीतने वाले इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह ने शुक्रवार को बलिया में कहीं।

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रसड़ा से तीसरी बार चुनाव जीतने के बाद विधायक ने पत्रकार वार्ता में कहा कि वर्तमान में जो राजनीति हो रही है, यह ठीक नहीं है। कारण कि जाति-पाति के नाम देश व प्रदेश में बने छोटे-छोटे संगठन व पार्टियों को बड़ी पार्टियों द्वारा प्रश्रय दिया जाना है।

इसका फायदा उठाकर ये लोग बड़ी पार्टियों को किसी भी कार्य के लिए मजबूर कर देते हैं, जो भविष्य के लिए किसी भी पार्टी के लिए घातक हो सकते हैं। कहा कि बसपा ही एक ऐसी पार्टी है जो वोट के लिए इनसे समझौता नहीं करती है। 

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लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर रचा है इतिहास

प्रदेश में बसपा ने एकमात्र बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट जीतने में सफलता पाई है। यहां से बसपा के टिकट पर उमाशंकर सिंह ने तीसरी बार जीत हासिल की है। हालांकि यह जीत भी कड़े संघर्ष में 6585 मतों से मिली है। ऐसे तो बसपा के लिए रसड़ा विधानसभा सीट पुरानी है।

इस सीट से कई बार घूरा राम चुनाव जीते। हालांकि तब यह सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित थी। वर्ष 2012 में परिसीमन बदलने के बाद यह सीट सामान्य हो गई और विधानसभा चुनाव में पहली बार उमाशंकर सिंह ने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और सपा के सनातन पांडेय को करीब 52 हजार मतों से हराया।

इसके बाद 2017 के चुनाव में जब भाजपा की लहर चल रही थी, तब भी बसपा के उमाशंकर सिंह ने भाजपा प्रत्याशी रामइकबाल सिंह को 33 हजार मतों से हराया। हालांकि इस बार चुनाव जीतने के लिए उमाशंकर को कड़ी टक्कर का सामना करना और 5194 मतों से सुभासपा प्रत्याशी महेंद्र चौहान को पराजित किया।

बता दें कि वर्ष 2007 में बसपा ने छह सीटों पर जीत हासिल की थी। हालांकि उस समय जिले में विधानसभा की आठ सीटें थीं। इसके बाद वर्ष 2012 में परिसीमन बदलने से जिले में सात विधानसभा सीटें हो गईं। इस वर्ष में केवल उमाशंकर ही जीते और वर्ष 2017 में यही केवल जीत दर्ज कर सके और इस चुनाव में तो प्रदेश में इकलौता जीत हासिल की है।

बसपा ने देखे कई उतार-चढ़ाव, 2012 के बाद से नहीं संभली

1984 में बसपा का गठन हुआ था। तब से लेकर आजतक पार्टी ने कई बार उतार-चढ़ाव देखे लेकिन 2012, 2017 और अब 2022 में जिस तरह पार्टी का जनाधार घटता गया उससे पार्टी का सफर आसान नहीं है। 1993 में बसपा 12 वीं विधानसभा चुनाव में पूरी तरह फॉर्म में उतरी।

यूपी की 164 प्रत्याशियों में बसपा के 67 प्रत्याशी जीते। यह जीत बसपा के लिए बड़ी थी। इन आंकड़ों ने हर किसी को चौंका दिया था। मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने हाथ मिला लिया। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। हालांकि दोनों दलों के बीच मनमुटाव शुरू हुआ और महज एक साल 181 दिन तक मुख्यमंत्री रहने के बाद मुलायम की सरकार गिर गई।

3 जून 1995 को मायावती यूपी की मुख्यमंत्री बनीं और वह महज 18 अक्टूबर 1995 तक 137 दिनों तक सीएम रहीं। राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया। 1996 में बीएसपी ने 296 सीटों पर प्रत्याशी उतारे जिसमें से केवल 67 सीटों पर ही उम्मीदवार जीते। बसपा का वोट प्रतिशत 19.64 रहा। 2002 में यूपी की 401 विधानसभा सीटों पर बसपा लड़ी, इनमें से 98 विधायक जीते।
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वोट प्रतिशत 23.06 रहा। 2007 में बंपर जीत के साथ बसपा के 403 में से 206 विधायक जीते और पार्टी को 30.43 फीसदी वोट मिले और मायावती मुख्यमंत्री बनीं। 2012 में बसपा को 403 सीटों में से महज 80 सीटों पर जीत मिली। 2017 में बसपा 403 सीटों वाली विधानसभा में 19 सीटों के साथ तीसरा स्थान मिला था। 2022 विधानसभा चुनाव में बसपा को प्रदेश में मात्र सीट हासिल हुई है जो जिले की रसड़ा विधानसभा सीट है जहां से उमाशंकर सिंह ने हैट्रिक लगाई है।
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